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Shiv Ji ke gale me saanp kyu hai: शिव जी ने अपने गले में क्यों धारण किया है नाग? जानिए इसके पीछे की कहानी

jeevanjali Published by: निधि Updated Sat, 30 Dec 2023 05:10 PM IST
सार

Shiv Ji ke gale me saanp kyu hai:  भगवान भोलेनाथ का स्वरूप सबसे निराला है। उनका स्वरूप जितना रहस्यमय और विचित्र है उतना ही आकर्षक भी। वे अपने शरीर पर भस्म, माथे पर चंद्रमा, अपनी जटा में गंगा और गले में नाग धारण करते हैं।

भगवान शिव
भगवान शिव- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Shiv Ji ke gale me saanp kyu hai:  भगवान भोलेनाथ का स्वरूप सबसे निराला है। उनका स्वरूप जितना रहस्यमय और विचित्र है उतना ही आकर्षक भी। वे अपने शरीर पर भस्म, माथे पर चंद्रमा, अपनी जटा में गंगा और गले में नाग धारण करते हैं। इन सभी चीजों को धारण करने के पीछे अलग-अलग किस्से हैं। भोलनाथ सिर्फ इंसानों पर ही नहीं बल्कि अन्य जीव-जंतुओं पर भी अपनी कृपा बरसाते हैं। उनके गले में नाग और वाहन नंदी इस बात का सबूत हैं। शिव जी नाग-नागिन के भी आराध्य देव हैं। नाग-नागिन भोलेनाथ को अपना भगवान मानते हैं। यही कारण है कि भगवान शिव के गले में हमेशा सर्पों की माला लिपटी रहती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव अपने गले में सर्प क्यों धारण करते हैं? चलिए जानते हैं इसके बारे में...
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शिव जी के गले में क्यों लिपटा रहता है सांप

पौराणिक कथा के अनुसार नागराज वासुकी भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे। वह सदैव भगवान शिव की आराधना में लीन रहता था। समुद्र मंथन के समय नागराज वासुकि ने जिस रस्सी से समुद्र मंथन किया था, उसका प्रयोग किया था। इसके बाद उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे नागलोक का राजा बना दिया। साथ ही अपने गले में आभूषण की भांति लिपटे रहने का वरदान दिया।

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शिव जी के अन्य प्रतीकों का रहस्य

नंदी

पुराणों के अनुसार नंदी और शिव एक ही हैं। ऋषि शिलाद की कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव ने उनके घर नंदी के रूप में जन्म लिया। तब नंदी की कठोर तपस्या के बाद शिव ने उन्हें अपने पसंदीदा वाहन के रूप में स्वीकार किया।

गंगा

ऐसा माना जाता है कि देवी गंगा भगवान शिव के करीब रहना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने पृथ्वी पर उतरने से पहले उग्र रूप धारण कर लिया। इस स्थिति को संभालने के लिए भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में रख लिया।

चंद्रमा

शिव पुराण के अनुसार चंद्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से हुआ था। सभी कन्याओं में चंद्रमा रोहिणी से विशेष स्नेह करते थे। जब अन्य कन्याओं ने इसकी शिकायत दक्ष से की तो दक्ष ने चंद्रमा को क्षय होने का श्राप दे दिया। तब इस श्राप से बचने के लिए चंद्रमा ने भगवान शिव की तपस्या की। चंद्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने चंद्रमा के प्राण बचाये और उन्हें अपने मस्तक पर धारण कर लिया।

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