Bhagavad Gita भगवद्गीता के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, माया के गुणों से मोहग्रस्त होने पर अज्ञानी पुरुष पूर्णतया भौतिक कार्यों में संलग्न रहकर उनमें आसक्त हो जाते हैं। इसके बाद श्री कृष्ण ने कहा,

Bhagavad Gita: भगवद्गीता के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, माया के गुणों से मोहग्रस्त होने पर अज्ञानी पुरुष पूर्णतया भौतिक कार्यों में संलग्न रहकर उनमें आसक्त हो जाते हैं। इसके बाद श्री कृष्ण ने कहा,
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा, निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः {अध्याय 3 श्लोक 30 }
मयि– मुझमें; सर्वाणि– सब तरह के; कर्माणि– कर्मों को; संन्यस्य– पूर्णतया त्याग करके; अध्यात्म– पूर्ण आत्मज्ञान से युक्त; चेतसा– चेतना से; निराशीः– लाभ की आशा से रहित, निष्काम; निर्ममः– स्वामित्व की भावना से रहित, ममतात्यागी; भूत्वा– होकर; युध्यस्व– लड़ो; विगत-ज्वरः– आलस्यरहित।
अर्थ - हे अर्जुन ! अपने सारे कार्यों को मुझ में समर्पित करके मेरे पूर्ण ज्ञान से युक्त होकर, लाभ की आकांशा से रहित, स्वामित्व के किसी दावे के बिना तथा आलस्य से रहित होकर युद्ध करो।
व्याख्या - इस श्लोक में श्री कृष्ण समझा रहे है कि मैंने तुम्हे ज्ञानी और अज्ञानी का अंतर समझा दिया है। इसलिए अब तुम्हे कोई शंका नहीं होनी चाहिए। तुम अपने लिए युद्ध नहीं कर रहे हो और ना ही इस युद्ध के परिणाम का तुमसे कोई लेना देना है। इसलिए अर्जुन, अब तुम अपने कर्म को मुझे सौंप दो। अब तुम पूर्ण ज्ञान से युक्त व्यक्ति की तरह अपने धर्म का पालन कर युद्ध करो। अब तुम किसी भी भौतिक वस्तु पर अपना अधिकार नहीं जमा सकते हो क्यूंकि कुछ भी तुम्हारा नहीं है और ना ही तुम आलस्य कर सकते हो क्यूंकि ऐसा करने से तुम "अकर्मता" को प्राप्त हो जाओगे। जाहिर सी बात है कि कब कोई व्यक्ति अपने सभी कर्मों को श्री भगवान् को सौंप देता है तो वो उससे प्राप्त वस्तु पर भी आपका अधिकार नहीं जमाता है। ऐसे में यहां श्री कृष्ण अर्जुन को सीधे युद्ध करने का आदेश देते है।
ये ते मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः, श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः { अध्याय 3 श्लोक 31 }
ये– जो; मे– मेरे; मतम्– आदेशों को; इदम्– इन; नित्यम्– नित्यकार्य के रूप में; अनुतिष्ठन्ति– नियमित रूप से पालन करते हैं; मानवाः– मानव प्राणी; श्रद्धा-वन्तः– श्रद्धा तथा भक्ति समेत; अनसूयन्तः– बिना ईर्ष्या के; मुच्यन्ते– मुक्त हो जाते हैं; ते– वे; अपि– भी; कर्मभिः– सकामकर्मों के नियमरूपी बन्धन से।
अर्थ - जो व्यक्ति मेरे आदेशों के अनुसार अपना कर्तव्य करते रहते हैं और ईर्ष्यारहित होकर इस उपदेश का श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं, वे सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।
व्याख्या - हम सब इस बात को समझते है कि श्री कृष्ण के द्वारा कही गए बातें वैदिक है। ऐसे में उनके उपदेश का पालन करना एक तरह से वेदों का पालन करना ही है। इस श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन को यही समझा रहे है कि मेरा उपदेश ही तुम्हे सकाम कर्म के बंधन से मुक्त कर सकता है। यही तुम मेरे आदेश के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन करोगे तो इस संसार के सभी बंधनों से मुक्त हो जाओगे। अज्ञानी व्यक्ति सदैव कर्म फल से जुड़कर इसी संसार में रम जाता है और दुःखी होता है लेकिन अर्जुन चूंकि कृष्ण को अपना गुरु मानकर जिज्ञासा कर रहा है इसलिए कृष्ण भी एक गुरु की भांति उसे सही रास्ता दिखा रहे हैं और उसे समझा रहे है कि इस युद्ध को करना उसके लिए क्यों आवश्यक है।
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