Bhagavad Gita: श्री कृष्ण कर्मयोगी व्यक्ति के बारे में समझाते हुए कहते है कि जो आत्मा में रत रहता है उसे न तो अपने नियत कर्मों को करने की आवश्यकता रह जाती है, न ऐसा कर्म न करने का कोई कारण ही रहता है।

Bhagavad Gita: भगवद्गीता के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, जिसका जीवन आत्म-साक्षात्कार युक्त है और जो अपने में ही से पूर्णतया सन्तुष्ट रहता है उसके लिए कुछ करणीय (कर्तव्य) नहीं होता। इसके आगे श्री कृष्ण ने कहा,
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्र्चन, न चास्य सर्वभूतेषु कश्र्चिदर्थव्यपाश्रयः
अर्थ - स्वरुपसिद्ध व्यक्ति के लिए न तो अपने नियत कर्मों को करने की आवश्यकता रह जाती है, न ऐसा कर्म न करने का कोई कारण ही रहता है। उसे किसी अन्य जीव पर निर्भर रहने की आवश्यकता भी नहीं रह जाती।
व्याख्या - कोई भी व्यक्ति जब कोई कर्म करता है तो उसके दो पहलु होते है। पहला या तो उस कर्म से उसे लाभ प्राप्त होगा और दूसरा उससे ना होने का भय रहेगा लेकिन इस श्लोक में श्री कृष्ण कर्मयोगी व्यक्ति के बारे में
समझाते हुए कहते है कि जो आत्मा में रत रहता है उसे न तो अपने नियत कर्मों को करने की आवश्यकता रह जाती है, न ऐसा कर्म न करने का कोई कारण ही रहता है। ऐसा व्यक्ति किसी की भी शरण ग्रहण नहीं करता है। वो सदैव अपने प्रिय श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए ही कर्म करता है ना कि भौतिक सुख का आनंद लेने के लिए।
अर्थ - कर्मफल में आसक्त हुए बिना मनुष्य को अपना कर्तव्य समझ कर निरन्तर कर्म करते रहना चाहिए क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करने से परब्रह्म (परम) की प्राप्ति होती है।
व्याख्या - जो भगवान् का भक्त होता है वो ईश्वर को ही सब कुछ मानता है। ऐसे में उसे ब्रह्म की प्राप्त कैसे होगी ? इसका रास्ता श्री कृष्ण ने समझाया है। वो कहते है कि मनुष्य जब कोई कर्म करता है तो उसे कभी भी उसका फल नहीं ग्रहण करना चाहिए। अगर अच्छा हुआ तो भी ईश्वर का और बुरा हुआ तो भी ईश्वर का ! ऐसे करने से उसे आसक्ति नहीं होगी। इसके अलावा कभी भी कर्म को करना नहीं छोड़ना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति इन नियमों का पालन करने में समर्थ हो जाता है तो जाहिर सी बात है उसे अनासक्त होकर कर्म करने का अभ्यास हो जाता है जिससे की उसे अंत में श्री भगवान् यानी कि उस परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो ही जाती है।
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