
Valmiki Ramayana: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, कामधेनु ने अपने शरीर से असंख्य योद्धा पैदा कर दिए और राजा विश्वामित्र की सेना का संहार कर दिया। महात्मा वसिष्ठ द्वारा अपनी सेना का संहार हुआ देख विश्वामित्र के सौ पुत्र अत्यन्त क्रोध में भर गये और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लेकर जप करने वालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनि पर टूट पड़े, तब उन महर्षि ने हुंकार मात्र से उन सबको जलाकर भस्म कर डाला।
महात्मा वसिष्ठ द्वारा विश्वामित्र के वे सभी पुत्र दो ही घड़ी में घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों सहित जलाकर भस्म कर डाले गये। अपने समस्त पुत्रों तथा सारी सेना का विनाश हुआ देख महायशस्वी विश्वामित्र लज्जित हो बड़ी चिन्ता में पड़ गये। पुत्र और सेना दोनों के मारे जाने से वे पंख कटे हुए पक्षी के समान दीन हो गये। उनका सारा बल और उत्साह नष्ट हो गया। वे मन-ही-मन बहुत खिन्न हो उठे। उनके एक ही पुत्र बचा था, उसको उन्होंने राजा के पद पर अभिषिक्त करके राज्य की रक्षा के लिये नियुक्त कर दिया और क्षत्रिय-धर्म के अनुसार पृथ्वी के पालन की आज्ञा देकर वे वन में चले गये।
हिमालय के पार्श्वभाग में, जो किन्नरों और नागों से सेवित प्रदेश है, वहाँ जाकर महादेवजी की प्रसन्नता के लिये महान् तपस्या का आश्रय ले वे तप में ही संलग्न हो गये, कुछ काल के पश्चात् वरदायक देवेश्वर भगवान् वृषभध्वज (शिव) ने महा-मुनि विश्वामित्र को दर्शन दिया और कहा, मैं तुम्हें वर देने के लिये आया हूँ तुम्हें जो वर पाना अभीष्ट हो, उसे कहो। महातपस्वी विश्वामित्र उन्हें प्रणाम करके बोले, यदि आप संतुष्ट हों तो अंग, उपांग, उपनिषद् और रहस्यों सहित धनुर्वेद मुझे प्रदान कीजिये। देवताओं, दानवों, महर्षियों, गन्धर्वो, यक्षों तथा राक्षसों के पास जो-जो अस्त्र हों, वे सब आपकी कृपा से मेरे हृदय में स्फुरित हो जाए। देवदेव ! यही मेरा मनोरथ है, जो मुझे प्राप्त होना चाहिये।
तब ‘एवमस्तु’ कहकर देवेश्वर भगवान् शङ्कर वहां से चले गये। देवेश्वर महादेव से वे अस्त्र पाकर महाबली विश्वामित्र को बड़ा घमंड हो गया वे अभिमान में भर गये। फिर तो वे पृथ्वीपति विश्वामित्र, वसिष्ठ के आश्रम पर जाकर भाँति-भाँति के अस्त्रों का प्रयोग करने लगे। जिनके तेज से वह सारा तपोवन दग्ध होने लगा। बुद्धिमान् विश्वामित्र के उस बढ़ते हुए अस्त्रतेज को देखकर वहाँ रहने वाले सैकड़ों मुनि भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओं में भाग चले।
महात्मा वसिष्ठ का वह आश्रम सूना हो गया। दो ही घड़ी में ऊसर भूमि के समान उस स्थान पर सन्नाटा छा गया जिसे देखकर ऋषि वसिष्ठ को क्रोध आ गया। उन्होंने कहा, डरो मत, मैं अभी इस गाधिपुत्र को नष्ट किये देता हूँ ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य कुहासे को मिटा देता है। ऐसा कहकर वे अत्यन्त क्रुद्ध हो धूम-रहित कालाग्नि के समान उद्दीप्त हो उठे और दूसरे यमदण्ड के समान भयंकर डंडा हाथ में उठाकर तुरंत उनका सामना करने के लिये तैयार हो गये।
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