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Valmiki Ramayana Part 58: राजा विश्वामित्र को आया कामधेनु गाय का लालच! जानें वजह

jeevanjaliPublished by:
निधि
सार

Valmiki Ramayana: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, महर्षि वसिष्ठ ने किया राजा विश्वामित्र का आदर सत्कार किया और कामधेनु को आज्ञा दी कि वो उनके मेहमान के भरपेट भोजन की व्यवस्था करें।

वाल्मीकि रामायण

Valmiki Ramayana: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, महर्षि वसिष्ठ ने किया राजा विश्वामित्र का आदर सत्कार किया और कामधेनु को आज्ञा दी कि वो उनके मेहमान के भरपेट भोजन की व्यवस्था करें। इसके बाद, कामधेनु ने जिसकी जैसी इच्छा थी, उसके लिये वैसी ही सामग्री जुटा दी। ईख, मधु, लावा, मैरेय, श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकार के बहुमूल्य भक्ष्य-पदार्थ प्रस्तुत कर दिये। गरम-गरम भात के पर्वत के सदृश ढेर लग गये। मिष्टान्न (खीर) और दाल भी तैयार हो गयी। दूध, दही और घी की तो नहरें बह चलीं। भाँति-भाँति के सुस्वादु रस, खाण्डव तथा नाना प्रकार के भोजनों से भरी हुई चाँदी की सहस्रों थालियाँ सज गयीं।

महर्षि वसिष्ठ ने विश्वामित्रजी की सारी सेना के लोगों को भलीभाँति तृप्त किया। उस सेना में बहुत-से हृष्ट-पुष्ट सैनिक थे। उन सबको वह दिव्य भोजन पाकर बड़ा संतोष हुआ। राजर्षि विश्वामित्र भी उस समय अन्तःपुर की रानियों, ब्राह्मणों और पुरोहितों के साथ बहुत ही हृष्ट पुष्ट हो गये। अमात्य, मन्त्री और भृत्यों सहित पूजित हो वे बहुत प्रसन्न हुए और वसिष्ठजी से इस प्रकार बोले, आप स्वयं मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा पूजन किया, भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। आप मुझ से एक लाख गाय लेकर यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये, क्योंकि यह गौ रत्नरूप है और रत्न लेने का अधिकारी राजा होता है।

ब्रह्मन्, मेरे इस कथन पर ध्यान देकर मुझे यह शबला गौ दे दीजिये, क्योंकि यह धर्मतः मेरी ही वस्तु है। धर्मात्मा मुनिवर भगवान् वसिष्ठ राजा को उत्तर देते हुए बोले, मैं एक लाख या सौ करोड़ अथवा चाँदी के ढेर लेकर भी बदले में इस शबला गौ को नहीं दूंगा। यह मेरे पास से अलग होने योग्य नहीं है। जैसे मनस्वी पुरुष की अक्षय कीर्ति कभी उससे अलग नहीं रह सकती, उसी प्रकार यह सदा मेरे साथ सम्बन्ध रखने वाली शबला गौ मुझसे पृथक् नहीं रह सकती। मेरा हव्य-कव्य और जीवन-निर्वाह इसी पर निर्भर है।

मेरा यह सब कुछ इस गौके ही अधीन है, इसमें संशय नहीं है, मैं सच कहता हूँ। यह गौ ही मेरा सर्वस्व है और यही मुझे सब प्रकार से संतुष्ट करने वाली है। राजन् ! बहुत-से ऐसे कारण हैं, जिनसे बाध्य होकर मैं यह शबला गौ आपको नहीं दे सकता। वसिष्ठ जी की ऐसी बातें सुनकर राजा विश्वामित्र को क्रोध आ गया लेकिन उन्होंने उस समय सोचा कि वशिष्ठ को और लालच दिया जाए। वो बोले, मैं आपको चौदह हजार ऐसे हाथी दे रहा हूँ, जिनके कसने वाले रस्से, गले के आभूषण और अंकुश भी सोने के बने होंगे और उन सबसे वे हाथी विभूषित होंगे।

इनके सिवा मैं आठ सौ सुवर्णमय रथ प्रदान करूँगा, जिनमें शोभा के लिये सोने के घुघुरू लगे होंगे और हर एक रथ में चार-चार सफेद रंग के घोड़े जुते हुए होंगे तथा अच्छी जाति और उत्तम देश में उत्पन्न महातेजस्वी ग्यारह हजार घोड़े भी आपकी सेवा में अर्पित करूँगा। इतना ही नहीं, नाना प्रकार के रंगवाली नयी अवस्था की एक करोड़ गाय भी दूंगा, परंतु यह शबला गौ मुझे दे दीजिये।

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