Sun God and Shani Dev Enmity: सूर्य देव और शनि देव में पिता-पुत्र का संबंध होने के बावजूद उनके बीच प्रेम न होकर शत्रुता थी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्यदेव को नौ ग्रहों का राजा माना जाता है और इन ग्रहों में शनिदेव को न्यायाधीश या दंडाधिकारी के तौर पर जाना जाता है। शनि देव अन्याय या गलत बात सहन नहीं करते थे, इसलिए उन्हें गलत करने वाले को दंड देने के कारण दंडाधिकारी के तौर पर भी जाना जाता है। यूं तो शनिदेव, सूर्यदेव के पुत्र हैं, लेकिन पिता-पुत्र के बीच कभी भी अच्छे संबंध नहीं रहे। यह अद्भुत कथा बताती है कि शनिदेव को उनके पिता सूर्यदेव से नफरत क्यों थी।
सूर्यदेव से क्यों नफरत करते थे शनिदेव?
सूर्य की पहली पत्नी और छाया का जन्म
सूर्यदेव का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री संध्या से हुआ था। संध्या ने सूर्यदेव के तेज को सहन करने में बहुत कठिनाई महसूस की। उनसे मनु, यमराज और यमुना नाम के तीन संतानें हुईं। एक दिन संध्या ने सूर्य के असहनीय तेज से तंग आकर अपनी तपस्या के बल पर अपने जैसी ही एक प्रतिकृति बनाई और उसका नाम छाया रखा। छाया को अपनी जगह पर रखकर, संज्ञा तपस्या करने के लिए हिमालय चली गईं।
शनिदेव का जन्म और सूर्य का अस्वीकार
सूर्यदेव ने छाया को ही अपनी पत्नी संज्ञा समझा और उनसे भी उन्हें संतानें हुईं, जिनमें शनिदेव प्रमुख थे। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे, तब उनकी माता छाया ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की, जिसकी वजह से उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा। इसी कारण शनिदेव का रंग जन्म से ही श्याम वर्ण (काला) था। जब सूर्यदेव ने शनिदेव के काले रंग को देखा, तो उन्होंने छाया पर संदेह किया और शनिदेव को अपना पुत्र मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने अपमानजनक शब्दों में कहा कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता है।
क्रोधित शनिदेव की दृष्टि
शनिदेव ने अपने पिता के अपमानजनक शब्दों और अपनी माता के प्रति उनके व्यवहार को सहन नहीं किया। अपने पिता के इस दुर्व्यवहार से क्रोधित होकर, बाल शनि ने सूर्यदेव की ओर देखा। उनकी दृष्टि इतनी शक्तिशाली थी कि सूर्यदेव उसी क्षण काले पड़ गए और उनके घोड़े भी रुक गए।
सूर्य का पश्चात्ताप और शिव का हस्तक्षेप
अपने इस विकट रूप को देखकर सूर्यदेव घबरा गए। उन्होंने भगवान शिव से सहायता मांगी। तब भगवान शिव ने सूर्यदेव को उनकी गलती का एहसास कराया। उन्होंने समझाया कि शनि तुम्हारे ही पुत्र हैं और तुम्हें उनका और उनकी माता का अपमान नहीं करना चाहिए था। सूर्यदेव को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने अपनी क्षमा याचना की और शनिदेव को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया।
पिता-पुत्र की दुश्मनी का निष्कर्ष
इस घटना के बाद सूर्यदेव ने शनिदेव को उनके कर्मों के अनुसार फल देने का अधिकार (न्यायाधीश) प्रदान किया, लेकिन जन्म के समय हुए इस अपमान को शनिदेव कभी भूल नहीं पाए। इसी कारण ज्योतिष शास्त्र में सूर्य (प्रकाश, पिता) और शनि (अंधकार, पुत्र) को एक-दूसरे का शत्रु माना जाता है। जब किसी कुंडली में ये दोनों ग्रह एक साथ आते हैं, तो यह उस व्यक्ति के जीवन में संघर्ष और कठिनाइयों का संकेत माना जाता है।
शनिदेव ने की थी भगवान शिव की कठोर तपस्या
पिता से बदला लेने के लिए शनि ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। जब शिव ने उनसे वरदान मांगने को कहा तो शनि ने कहा कि पिता सूर्य ने उनकी माता छाया का अनादर कर उन्हें प्रताड़ित किया है। इसलिए आप मुझे पिता सूर्य से अधिक शक्तिशाली व पूज्य होने का वरदान दें। तब भगवान शिव ने वरदान दिया कि नवग्रहों में श्रेष्ठ स्थान पाने के साथ ही सर्वोच्च न्यायाधीश और दंडाधिकारी भी रहोगे। साधारण मानव तो क्या देवता, असुर, सिद्ध, विद्याधर, गंधर्व व नाग सभी तुम्हारे नाम से भयभीत होंगे। तभी से शनिदेव का शनि ग्रहों में सबसे शक्तिशाली और संपूर्ण सिद्धियों के दाता हैं। शनिदेव के हाथों में लोहे का चमत्कारिक अस्त्र है। यह प्रसन्न हो जाएं तो रंक से राजा बना देते हैं और क्रोधित हो जाएं तो राजा से रंक भी बना सकते हैं।