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Putrada Ekadashi: पुत्रदा एकादशी मनाने की परंपरा कैसे हुई शुरू? जानें इसके पीछे की कहानी

JeevanjaliPublished by:
नीरज पटेल
सार

Putrada Ekadashi Vart: पुत्रदा एकादशी का पर्व हिन्दू धर्म में बड़े ही उत्साह से मनाया जाता है। इस व्रत के करने से लोगों को कई प्रकार की समस्याओं से छुटकारा मिलता है और जीवन में आने वाली बाधाएं खत्म होती हैं।  

पुत्रदा एकादशी मनाने की परंपरा कैसे हुई शुरू? जानें इसके पीछे की कहानी
Putrada Ekadashi 2025 Parampara: हिन्दू धर्म में पुत्रदा एकादशी व्रत का महिलाओं के लिए बहुत अधिक होता है। ये व्रत महिलाओं द्वारा संतान प्राप्ति की कामना के लिए रखा जाता है। यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और इसकी शुरुआत स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को एक कथा सुनाकर की थी। यह कथा हमें बताती है कि कैसे इस व्रत का पालन करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी कथा

द्वापर युग में महीजित नाम का एक राजा महिष्मती नगरी पर शासन करता था। इस राजा के पास भी सब कुछ था, लेकिन संतान न होने के कारण वह हमेशा दुखी रहता था। संतान प्राप्ति के लिए उसने कई उपाय किए, लेकिन सब व्यर्थ गए। जब राजा के दुख से पूरी प्रजा चिंतित हो गई, तो वे सभी मिलकर लोमश ऋषि के पास गए। ऋषियों ने राजा की कुंडली देखकर बताया कि राजा ने अपने पिछले जन्म में एक गाय को पानी पीने से रोका था, जिसके कारण उन्हें संतानहीनता का दुख भोगना पड़ रहा है।


तब लोमश ऋषि ने प्रजा से कहा कि अगर वे सब मिलकर श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत रखें और उस व्रत का सारा पुण्य राजा को दान कर दें, तो राजा को संतान सुख मिल सकता है। प्रजा ने ऐसा ही किया। व्रत के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और नौ महीने बाद एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।

पुत्रदा एकादशी कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में भद्रावती नामक एक नगरी थी, जिस पर सुकेतुमान नाम के राजा का शासन था। राजा के पास धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी और उनकी प्रजा भी सुखी थी, लेकिन राजा बहुत दुखी रहते थे, क्योंकि उनके और उनकी पत्नी शैव्या के कोई संतान नहीं थी। राजा को हमेशा यह चिंता सताती थी कि उनके बाद उनका राजपाट कौन संभालेगा और उनकी मृत्यु के बाद उनके पूर्वजों का श्राद्ध और पिंडदान कौन करेगा।

इस दुख से निराश होकर एक दिन राजा अपना राजपाट मंत्रियों को सौंपकर जंगल में चले गए। कई दिन भटकने के बाद वे एक आश्रम में पहुंचे, जहां उन्होंने अनेक ऋषियों को देखा। राजा ने श्रद्धापूर्वक सभी ऋषियों को प्रणाम किया। राजा के दुखी चेहरे को देखकर ऋषियों ने उनके कष्ट का कारण पूछा।

राजा ने अपनी व्यथा सुनाई कि उनके पास सब कुछ है, लेकिन संतान न होने के कारण उनका जीवन व्यर्थ है। तब ऋषियों ने राजा को बताया कि आज पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे पुत्रदा एकादशी कहते हैं। उन्होंने राजा से कहा कि इस दिन विधि-विधान से व्रत करने और भगवान विष्णु की पूजा करने से संतान की प्राप्ति होती है।

राजा ने ऋषियों की बात मानकर उस दिन पूरी श्रद्धा से पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा। व्रत के प्रभाव से राजा को कुछ समय बाद एक तेजस्वी और यशस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई, जिससे उनका जीवन सफल हो गया।

इस प्रकार, इन कथाओं से यह परंपरा शुरू हुई कि संतान की कामना रखने वाले दंपत्ति पुत्रदा एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से करते हैं, जिससे उन्हें भगवान विष्णु की कृपा से संतान सुख की प्राप्ति होती है।

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