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Ganesh aarti: जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा, इस आरती से करें भगवान गणेश की पूजा, जीवन से सारे विघ्न होंगे दूर

सार

गणेश जी की आरती  - जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥ दिवाली के दिन लोग भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की पूजा का विधान है,दिवाली का त्योहार भारत में बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है

दिवाली 2023
 गणेश जी की आरती किसी भी अनुष्ठान और पूजा में बहुत ही शुभ माना जाता है । भगवान गणेश की आरती किए बिना पूजा अधूरी मानी जाती है ।  हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को दिवाली का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। दिवाली के दिन लोग भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की पूजा का विधान है,दिवाली का त्योहार भारत में बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है,दिवाली के दिन मां लक्ष्मी के साथ भगवान श्री गणेश और भगवान कुबेर की पूजा का भी विधान है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान गणेश  की पूजा करने से सभी विघ्न और बाधाएं हमेशा के लिए दूर होती हैं। इसलिए उन्हें विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। आपको बता दें कि किसी भी शुभ काम से पहले भगवान गणेश की पूजा अर्चना की जाती है वो सभी देवों में प्रथम पूजनीय हैं दिवाली के दिन मां लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा विधान है बिना इनकी पूजा के दिवाली की पूजा अधूरी मानी जाती है दिवाली के दिन भगवान गणेश की पूजा करते समय ये आरती जरूर गाए।



गणेश जी की आरती 


जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

पान चढ़े फल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे संत करें सेवा॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥

मंत्र

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। 
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बक:। 
नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्रराजक :।। 

धूम्रवर्णों भालचन्द्रो दशमस्तु विनायक:। 
गणपर्तिहस्तिमुखो द्वादशारे यजेद्गणम।।' 

 

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