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Lord Ganesh and Parshuram: भगवान गणेश और परशुराम के बीच क्यों हुआ था युद्ध, क्या थी वजह?

JeevanjaliPublished by:
नीरज पटेल
सार

Ganesh Puja: भगवान गणेश और परशुराम के बीच हुआ यह युद्ध केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह कर्तव्य, भक्ति और विनम्रता की सीख देने वाली कथा है। यही कारण है कि आज भी गणेश जी को एकदंत नाम से स्मरण किया जाता है और उनके इस स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है।
 

भगवान गणेश और परशुराम के बीच क्यों हुआ था युद्ध, क्या थी वजह?
Lord Ganesh and Parshuram Yudh: हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। वहीं परशुराम, भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं, जिन्हें क्रोध और पराक्रम का प्रतीक माना गया है। पुराणों में एक रोचक कथा वर्णित है जिसमें गणेश और परशुराम के बीच युद्ध हुआ था। आइए जानते हैं इसकी पौराणिक वजह। कथा के अनुसार, एक समय भगवान परशुराम, भगवान शिव से मिलने कैलाश पर्वत पहुंचे। वे अपने गुरु भगवान शंकर को अपनी भक्ति और श्रद्धा अर्पित करना चाहते थे, लेकिन उस समय भगवान शिव माता पार्वती के साथ विश्राम कर रहे थे।

गणेश जी का पहरेदारी करना

गणेश जी उस समय कैलाश द्वार पर पहरेदारी कर रहे थे। माता पार्वती ने उन्हें आदेश दिया था कि जब तक वे विश्राम कर रही हैं, तब तक कोई भी अंदर प्रवेश न कर पाए। गणेश जी अपनी माता के आदेश का पालन करने में अडिग थे।

प्रवेश से रोके जाने पर क्रोध

जब परशुराम वहां पहुंचे तो गणेश जी ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। परशुराम ने कई बार समझाया कि वे भगवान शिव के परम भक्त हैं और उनसे मिलना चाहते हैं, लेकिन गणेश जी अपने कर्तव्य और माता के आदेश पर अटल रहे। इस पर परशुराम का क्रोध भड़क उठा। उन्होंने इसे अपमान समझा और गणेश जी से युद्ध करने लगे।

गणेश जी का दांत

युद्ध के दौरान परशुराम ने अपने फरसे (पारशु) का प्रयोग किया। यह फरसा उन्हें स्वयं भगवान शिव से प्राप्त हुआ था। जब परशुराम ने क्रोध में आकर फरसा फेंका, तो गणेश जी ने उसका सम्मान करते हुए उसे रोकने का प्रयास नहीं किया, क्योंकि वह उनके पिता शिव का दिया हुआ अस्त्र था।
फरसा सीधे गणेश जी के एक दांत पर लगा और वह टूट गया। तभी से गणेश जी को एकदंत कहा जाने लगा।

युद्ध का अंत

जब माता पार्वती को यह घटना ज्ञात हुई तो वे अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्होंने परशुराम को श्राप देने की ठानी, लेकिन भगवान शिव ने बीच में आकर स्थिति को संभाला और माता पार्वती को शांत किया। उन्होंने समझाया कि यह घटना नियति थी और इसी के कारण गणेश जी को एकदंत स्वरूप प्राप्त हुआ है। यह कथा हमें दो महत्वपूर्ण संदेश देती है। 
  • कर्तव्य पालन का महत्व - गणेश जी ने हर परिस्थिति में अपनी माता के आदेश का पालन किया, चाहे इसके लिए उन्हें युद्ध ही क्यों न करना पड़ा।
  • संयम और सम्मान - गणेश जी ने पिता शिव के अस्त्र का अपमान न करके अपनी विनम्रता और संयम का परिचय दिया।

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