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Shiv Purana Part 103: भगवान शंकर ने पर्वतराज हिमालय की क्या बात नहीं मानी? शिव ने दिया त्याग का उपदेश

jeevanjaliPublished by:
निधि
सार

Shiv Purana: शिव पुराण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि शिव ने " गंगावतार" नाम के तीर्थ में तपस्या करने का प्रण लिया और हिमवान को आदेश दिया कि कोई भी इस स्थान में नहीं आना चाहिए।

शिव पुराण

Shiv Purana: शिव पुराण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि शिव ने " गंगावतार" नाम के तीर्थ में तपस्या करने का प्रण लिया और हिमवान को आदेश दिया कि कोई भी इस स्थान में नहीं आना चाहिए। तदनन्तर शैलराज हिमालय उत्तम फल-फूल लेकर अपनी पुत्री के साथ हर्षपूर्वक भगवान् हर के समीप गये। वहाँ जाकर उन्होंने ध्यान- परायण त्रिलोकीनाथ शिव को प्रणाम किया और अपनी अद्भुत कन्या काली को हृदय से उनकी सेवा में अर्पित कर दिया। फल-फूल आदि सारी सामग्री उनके सामने रखकर पुत्री को आगे करके शैलराज ने शम्भु से कहा-‘भगवन् ! मेरी पुत्री आप भगवान् चन्द्रशेखर की सेवा करने के लिये उत्सुक है।

अत: आपके आराधन की इच्छासे मैं इसको साथ लाया हूँ। यह अपनी दो सखियों के साथ सदा आप शंकर की ही सेवा में रहे। तब भगवान् शंकर ने उस परम मनोहर कामरूपिणी कन्या को देखकर आँखें मुँद लीं और अपने त्रिगुणातीत, अविनाशी, परमतत्त्वमय उत्तम रूप का ध्यान आरम्भ किया। उस समय सर्वेश्वर एवं सर्वव्यापी जटाजूटधारी वेदान्तवेद्य चन्द्रकला विभूषण शम्भु उत्तम आसन पर बैठकर नेत्र बंद किये तप (ध्यान)-में ही लग गये। यह देख हिमाचल ने मस्तक झुकाकर पुनः उनके चरणों में प्रणाम किया।

यद्यपि उनके हृदयमें दीनता नहीं थी, तो भी वे उस समय इस संशय में पड़ गये कि न जाने भगवान् मेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगे या नहीं। महेश्वर बोले- गिरिराज ! तुम अपनी इस कुमारी कन्या को घर में रखकर ही नित्य मेरे दर्शन को आ सकते हो, अन्यथा मेरा दर्शन नहीं हो सकता। महेश्वरकी ऐसी बात सुनकर शिवा के पिता हिमवान् मस्तक झुकाकर उन भगवान् शिव से बोले-‘प्रभो ! यह तो बताइये, किस कारण से मैं इस कन्याके साथ आपके दर्शन के लिये नहीं आ सकता ? क्या यह आपकी सेवा के योग्य नहीं है? फिर इसे नहीं लाने का क्या कारण है, यह मेरी समझ में नहीं आता।

आगे शिव ने कहा, मैं तपस्वी, योगी और सदा माया से निर्लिप्त रहने वाला हूं। मुझे युवती स्त्री से क्या प्रयोजन है? तपस्वियों के श्रेष्ठ आश्रय हिमालय ! इसलिये फिर तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये, क्योंकि तुम वेदोक्त, धर् ममें प्रवीण, ज्ञानियों में श्रेष्ठ और विद्वान् हो। अचलराज ! स्त्री के संग से मन में शीघ्र ही विषय-वासना उत्पन्न हो जाती है। उससे वैराग्य नष्ट होता है और वैराग्य न होने से पुरुष उत्तम तपस्या से भ्रष्ट हो जाता है। इसलिये शैल ! तपस्वी को स्त्रियों का संग नहीं करना चाहिये। क्योंकि स्त्री महा विषय-वासना की जड़ एवं ज्ञान-वैराग्य का विनाश करने वाली होती है।

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