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Shiv Purana Part 102: शिव "गंगावतार" नामक तीर्थ पर तपस्या करने क्यों गये? गिरिराज हिमवान ने दिया वचन

jeevanjaliPublished by:
निधि
सार

Shiv Purana: शिव पुराण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि शिव के पसीने की बूंद से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसे पृथ्वी ने धारण किया और वो बाद में मंगल के नाम से प्रसिद्द होकर ग्रहों के सेनापति हुए। उधर शक्तिस्वरूपा पार्वती हिमालय के घर में रहकर बढ़ने लगीं।

शिव पुराण

Shiv Purana: शिव पुराण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि शिव के पसीने की बूंद से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसे पृथ्वी ने धारण किया और वो बाद में मंगल के नाम से प्रसिद्द होकर ग्रहों के सेनापति हुए। उधर शक्तिस्वरूपा पार्वती हिमालय के घर में रहकर बढ़ने लगीं। जब उनकी अवस्था आठ वर्ष की हो गयी, तब सती के विरह से कातर हुए शम्भु को उनके जन्म का समाचार मिला। इसी बीच में लौकिक गति का आश्रय ले शम्भु ने अपने मन को एकाग्र करने के लिये तप करने का विचार किया।

नन्दी आदि कुछ शान्त पार्षदों को साथ ले वे हिमालय के उत्तम शिखर पर "गंगावतार" नामक तीर्थ में चले आये, जहाँ पूर्वकाल में ब्रह्मधाम से च्युत होकर समस्त पापराशि का विनाश करने के लिये चली हुई परम पावनी गंगा पहले-पहल भूतल पर अवतीर्ण हुई थीं। जितेन्द्रिय हर ने वहीं रहकर तपस्या आरम्भ की। वे आलस्य रहित हो चेतन, ज्ञानस्वरूप, नित्य, ज्योतिर्मय, निरामय, जगन्मय, चिदानन्द-स्वरूप, द्वैतहीन तथा आश्रयरहित अपने आत्मभूत परमात्मा का एकाग्रभाव से चिन्तन करने लगे। भगवान् हर के ध्यान परायण होने पर नन्दी-भृंगी आदि कुछ अन्य पार्षदगण भी ध्यान में तत्पर हो गये।

इसी समय गिरिराज हिमवान् उस ओषधि-बहुल शिखर पर भगवान् शंकर का शुभागमन सुनकर उनके प्रति आदर की भावना से वहाँ आये। आकर सेवकों-सहित गिरिराज ने भगवान् रुद्र को प्रणाम किया, उनकी पूजा की और अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़ उनका सुन्दर स्तवन किया। फिर हिमालय ने कहा- ‘प्रभो ! मेरे सौभाग्य का उदय हुआ है, जो आप यहाँ पधारे हैं। आप दीनवत्सल हैं।

आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मेरा जीवन सफल हुआ और आज मेरा सब कुछ सफल हो गया, क्योंकि आपने यहाँ पदार्पण करने का कष्ट उठाया है। महेश्वर ! आप मुझे अपना दास समझकर शान्तभाव से मुझे सेवा के लिये आज्ञा दीजिये। मैं बड़ी प्रसन्नता से अनन्य चित्त होकर आपकी सेवा करुँगा। महेश्वर बोले-शैलराज ! मैं तुम्हारे शिखर पर एकान्त में तपस्या करने के लिये आया हूँ। तुम ऐसा प्रबन्ध करो, जिससे कोई भी मेरे निकट न आ सके।

जिस साधन से यहाँ मेरी तपस्या बिना किसी विघ्न-बाधा के चालू रह सके, उसे इस समय प्रयत्न पूर्वक करो। पर्वतप्रवर! मेरी यही सबसे बड़ी सेवा है। गंगावतरण नामक स्थान में, जो मेरे पृष्ठ- भाग में ही है, मेरी आज्ञा मानकर

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