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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand, Sarga 98-99: राजकुमार भरत ने किस युक्ति से लगाया श्री राम का पता?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Fri, 21 Jun 2024 03:04 PM IST
सार

Valmiki Ramayana, Ayodhya Kand, Canto 98, 99: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताएगें की आगे क्या हुआ- कैसे श्री राम के समझाने पर लक्ष्मण जी शांत होते है वही दूसरी ओर राजकुमार भरत श्री राम से मिलने चित्रकूट पर्वत पर आ जाते है।

Valmiki Ramayana,
Valmiki Ramayana,- फोटो : JEEVANJALI

विस्तार

Valmiki Ramayana, Ayodhya Kand, Canto 98, 99: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताएगें की आगे क्या हुआ- कैसे श्री राम के समझाने पर लक्ष्मण जी शांत होते है वही दूसरी ओर राजकुमार भरत श्री राम से मिलने चित्रकूट पर्वत पर आ जाते है। इसके बाद, जब सारी सेना विनीत भाव से यथास्थान ठहर गयी, तब भरत ने अपने भाई शत्रुघ्न से कहा - बहुत-से मनुष्यों के साथ इन निषादों को भी साथ लेकर तुम्हें शीघ्र ही इस वन में चारों ओर श्रीरामचन्द्रजी की खोज करनी चाहिये। 
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निषादराज गुह ने किय श्रीराम का इंतजार

निषादराज गुह स्वयं भी धनुष-बाण और तलवार धारण करने वाले अपने सहस्रों बन्धु-बान्धवों से घिरे हुए जायँ और इस वन में ककुत्स्थवंशी श्रीराम और लक्ष्मण का अन्वेषण करें। मैं स्वयं भी मन्त्रियों, पुरवासियों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणों के साथ उन सबसे घिरा रहकर पैदल ही सारे वन में विचरण करूँगा। वक्ताओं में श्रेष्ठ भरत पर्वतशिखरों पर उत्पन्न हुए वृक्षसमूहों के, जिनकी शाखाओं के अग्रभाग फूलों से भरे थे, बीच से निकले। 

चित्रकूट पर्वत पर बना था श्री राम का आश्रम

आगे जाकर वे बड़ी तेजी से चित्रकूट पर्वत के एक शाल-वृक्ष पर चढ़ गये और वहाँ से उन्होंने श्री रामचन्द्रजी के आश्रम पर सुलगती हुई आग का ऊपर उठता हुआ धुआँ देखा। उस धूम को देखकर श्रीमान् भरत को अपने भाई शत्रुघ्न-सहित बड़ी प्रसन्नता हुई और ‘यहीं श्रीराम हैं’ यह जानकर उन्हें अथाह जल से पार हो जाने के समान संतोष प्राप्त हआ। इस प्रकार चित्रकूट पर्वत पर पुण्यात्मा महर्षियों से युक्त श्रीरामचन्द्रजी का आश्रम देखकर महात्मा भरत ने ढूँढ़ने के लिये आयी हुई सेना को पुनः पूर्व स्थान पर ठहरा दिया और वे स्वयं गुह के साथ शीघ्रतापूर्वक आश्रम की ओर चल दिये। 
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गुरुभक्त भरत महर्षि वसिष्ठ को श्री राम ने दिया ये संदेश 

सेना के ठहर जाने पर भाई के दर्शन के लिये उत्कण्ठित होकर भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्न को आश्रम के चिह्न दिखाते हुए उसकी ओर चले। गुरुभक्त भरत महर्षि वसिष्ठ को यह संदेश देकर कि आप मेरी माताओं  को साथ लेकर शीघ्र ही आइये, तुरंत आगे बढ़ गये। सुमन्त्र भी शत्रुघ्न के समीप ही पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्हें भी भरत के समान ही श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की तीव्र अभिलाषा थी। चलते-चलते ही श्रीमान् भरत ने तपस्वीजनों के आश्रमों के समान प्रतिष्ठित हुई भाई की पर्णकुटी और झोंपड़ी देखी।
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