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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand Sarga 97: श्री राम के किन वचनों को सुनकर लज्जित हुए लक्ष्मण?

जीवांजलि Published by: निधि Updated Thu, 20 Jun 2024 04:40 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand Sarga 97: राजकुमार भरत की सेना देखकर लक्ष्मण जी को ऐसा लगा कि वो राम का अहित करने के लिए आ रहे है इसलिए उन्होने राम से कहा कि वो युद्ध के लिए तत्पर हो रहे हैं।

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand Sarga 97
Valmiki Ramayana Ayodhya Kand Sarga 97- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand Sarga 97: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- राजकुमार भरत की सेना देखकर लक्ष्मण जी को ऐसा लगा कि वो राम का अहित करने के लिए आ रहे है इसलिए उन्होने राम से कहा कि वो युद्ध के लिए तत्पर हो रहे हैं। इसके बाद, लक्ष्मण भरत के प्रति रोषावेश के कारण क्रोधवश अपना विवेक खो बैठे थे, उस अवस्था में श्रीराम ने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया। वो बोले, भरत बड़े भ्रातृभक्त हैं। वे मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हैं। मुझे तो ऐसा मालूम होता है, भरत ने अयोध्या में आने पर जब सुना है कि मैं तुम्हारे और जानकी के साथ जटा-वल्कल धारण करके वन में आ गया हूँ, तब उनकी इन्द्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठी हैं और वे कुलधर्म का विचार करके स्नेहयुक्त हृदय से हमलोगों से मिलने आये हैं। इन भरत के आगमन का इसके सिवा दूसरा कोई उद्देश्य नहीं हो सकता। 
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माता कैकेयी ने भरत से मिलकर क्या कहा- What did mother Kaikeyi say after meeting Bharat ?

माता कैकेयी के प्रति कुपित हो, उन्हें कठोर वचन सुनाकर और पिताजी को प्रसन्न करके श्रीमान् भरत मुझे राज्य देने के लिये आये हैं। भरत का हम लोगों से मिलने के लिये आना सर्वथा समयोचित है वे हमसे मिलने के योग्य हैं। हमलोगों का कोई अहित करने का विचार तो वे कभी मन में भी नहीं ला सकते। भरत ने तुम्हारे प्रति पहले कब कौन-सा अप्रिय बर्ताव किया है, जिससे आज तुम्हें उनसे ऐसा भय लग रहा है और तुम उनके विषय में इस तरह की आशङ्का कर रहे हो? भरत के आने पर तुम उनसे कोई कठोर या अप्रिय वचन न बोलना। यदि तुमने उनसे कोई प्रतिकूल बात कही तो वह मेरे ही प्रति कही हुई समझी जायगी। कितनी ही बड़ी आपत्ति क्यों न आ जाय, पुत्र अपने पिता को कैसे मार सकते हैं? अथवा भाई अपने प्राणों के समान प्रिय भाई की हत्या कैसे कर सकता है ?
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अपने भाई से मिलने पर्वत पर आ गए भरत ! Bharat has come to the mountain to meet his brother!

अपने धर्मपरायण भाई के ऐसा कहने पर उन्हीं के हित में तत्पर रहने वाले लक्ष्मण लज्जावश मानो अपने अङ्गों में ही समा गये। श्रीराम का पूर्वोक्त वचन सुनकर लज्जित हुए लक्ष्मण ने कहा, मैं समझता हूँ, हमारे पिता महाराज दशरथ स्वयं ही आपसे मिलने आये हैं। उधर भरत ने सेना को आज्ञा दी कि यहाँ किसी को हम लोगों के द्वारा बाधा नहीं पहुँचनी चाहिये। उनका यह आदेश पाकर समस्त सैनिक पर्वत के चारों ओर नीचे ही ठहर गये। उस समय हाथी, घोड़े और मनुष्यों से भरी हुई इक्ष्वाकुवंशी नरेश की वह सेना पर्वत के आस-पास की डेढ़ योजन ( छः कोस ) भूमि घेरकर पड़ाव डाले हुए थी। नीतिज्ञ भरत धर्म को सामने रखते हुए गर्व  को त्यागकर रघुकुलनन्दन श्रीराम को प्रसन्न करने के लिये जिसे अपने साथ ले आये थे, वह सेना चित्रकूट पर्वत के समीप बड़ी शोभा पा रही थी।
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