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Valmiki Ramayana Ayodhya Kanda Sarga 91-92: ऋषि भारद्वाज ने किया राजकुमार भरत का भव्य स्वागत!

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Thu, 13 Jun 2024 05:07 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kanda Sarga 91-92: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है कि भरद्वाज मुनि राजकुमार भरत से बेहद खुश होकर उन्हें श्री राम का पता बता देते है और एक रात्रि अपने पास ही रुकने का आग्रह करते है।

Valmiki Ramayana
Valmiki Ramayana- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kanda Sarga 91-92: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है कि भरद्वाज मुनि राजकुमार भरत से बेहद खुश होकर उन्हें श्री राम का पता बता देते है और एक रात्रि अपने पास ही रुकने का आग्रह करते है। जब भरत ने उस आश्रम में ही निवास का दृढ़ निश्चय कर लिया, तब मुनि ने कैकेयीकुमार भरत को अपना आतिथ्य ग्रहण करने के लिये न्यौता दिया। तदनन्तर उन महर्षि ने आज्ञा दी कि , सेना को यहीं ले आओ। तब भरत ने सेना को वहीं बुलवा लिया। इसके बाद महर्षि भरद्वाज के द्वारा सेनासहित भरत का उचित आदर सत्कार किया गया। 
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भरत ने पूछा- कहाँ है श्रीराम का आश्रम?

जैसे देवता नन्दनवन में विहार करते हैं, उसी प्रकार भरद्वाज मुनि के रमणीय आश्रम में यथेष्ट क्रीडा विहार करते हुए उन लोगों की वह रात्रि बड़े सुख से बीती। परिवार सहित भरत इच्छानुसार मुनि का आतिथ्य ग्रहण करके रात भर आश्रम में ही रहे। फिर सबेरे जाने की आज्ञा लेने के लिये वे महर्षि भरद्वाज के पास गये। भरत बोले, धर्मपरायण महात्मा श्रीराम का आश्रम कहाँ है ? कितनी दूर है ? और वहाँ पहुँचने के लिये कौन-सा मार्ग है? इसका भी मुझसे स्पष्ट रूप से वर्णन करें। इस प्रकार पूछे जाने पर महातपस्वी, महातेजस्वी भरद्वाज मुनि ने भाई के दर्शन की लालसा वाले भरत को उचित मार्ग दिखा दिया। 
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देवी कौसल्या ने क्यों रखा उपवास?

फिर महाराज दशरथ की स्त्रियाँ, जो सवारी पर ही रहने योग्य थीं, सवारियों को छोड़कर ब्रह्मर्षि भरद्वाज को प्रणाम करने के लिये उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गयीं। उपवास के कारण अत्यन्त दुर्बल एवं दीन हुई देवी कौसल्या ने, जो काँप रही थीं, सुमित्रा देवी के साथ अपने दोनों हाथों से भरद्वाज मुनि के पैर पकड़ लिये। तत्पश्चात् जो अपनी असफल कामना के कारण सब लोगों के लिये निन्दित हो गयी थी, उस कैकेयी ने लज्जित होकर वहाँ मुनि के चरणों का स्पर्श किया और उन महामुनि भगवान् भरद्वाज की परिक्रमा करके वह दीनचित्त हो उस समय भरत के ही पास आकर खड़ी हो गयी। 

भरत ने मुनि भारद्वाज से ली आज्ञा 

श्रीराम का पता जानकर और मुनि का आशीर्वाद पाकर कृतकृत्य हुए भरत ने मुनि को मस्तक झुका उनकी प्रदक्षिणा करके जाने की आज्ञा ले सेना को कूच के लिये तैयार होने का आदेश दिया। हाथी-घोड़ों से भरी हुई वह विशाल वाहिनी दक्षिण दिशा को घेरकर उमड़ी हुई महामेघों की घटा के समान चल पड़ी। गङ्गा के उस पार पर्वतों तथा नदियों के निकटवर्ती वनों को, जो मृगों और पक्षियों से सेवित थे, लाँघकर वह आगे बढ़ गयी। 

उस सेना के हाथी और घोड़ों के समुदाय बड़े प्रसन्न थे। जंगल के मृगों और पक्षिसमूहों को भयभीत करती हुई भरत की वह सेना उस विशाल वन में प्रवेश करके वहाँ बड़ी शोभा पा रही थी।
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