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Valmiki Ramayana, Ayodhya Kanda, Sarga 90: ऋषि भारद्वाज ने ऐसा क्या कहा जिससे राजकुमार भरत रो पड़े?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Wed, 12 Jun 2024 06:17 PM IST
सार

Valmiki Ramayana, Ayodhya Kanda, Sarga 90: राजकुमार भरत ने भरद्वाज के चरणों में प्रणाम किया। महातेजस्वी भरद्वाज इस बात को समझ गए कि यह राजा दशरथ के पुत्र हैं और उन दोनों का कुशल समाचार पूछा।

Valmiki Ramayana
Valmiki Ramayana- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana, Ayodhya Kanda, Sarga 90: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि भरत ने श्री राम को लौटा लाने की प्रतिज्ञा की और गंगा को पार करके भरद्वाज मुनि के आश्रम पर जा पहुंचे। इसके बाद, राजकुमार भरत ने भरद्वाज मुनि के आश्रम में प्रवेश किया और उन्हें दूर से ही उनका दर्शन होने लगा। उन्होंने अपने मंत्रियों को वहीं खड़ा कर दिया और अपने पुरोहित वशिष्ठ जी को आगे करके वह पीछे-पीछे ऋषि के पास गए। 
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वशिष्ठ और भारद्वाज मुनि का मिलन

वशिष्ठ को जब भारद्वाज मुनि ने देखा तो वह अपने आसन से उठ गए और अपने शिष्यों से कहा, वशिष्ठ जी को शीघ्रतापूर्वक मेरे पास ले आए। इसके बाद वशिष्ठ और भारद्वाज मुनि का मिलन हुआ। राजकुमार भरत ने भरद्वाज के चरणों में प्रणाम किया। महातेजस्वी भरद्वाज इस बात को समझ गए कि यह राजा दशरथ के पुत्र हैं और उन दोनों का कुशल समाचार पूछा। राजा दशरथ की मृत्यु के बारे में भरद्वाज जानते थे इसलिए उन्होंने इस विषय में राजकुमार भरत से कोई प्रश्न नहीं किया। इसके बाद भरद्वाज मुनि ने राजकुमार भारत से पूछा कि तुम राज्य तो कर रहे हो ना? 

भरद्वाज मुनि ने राजकुमार भरत से ऐसा कहा जिसे वो रोने लगे?

तुम्हें यहां वन में आने की क्या आवश्यकता पड़ गई? यह सब मुझे बताओ? जो शत्रुओं का नाश करने वाला है, जिस पुत्र को कौशल्या ने जन्म दिया है तथा तुम्हारे पिता ने अपनी स्त्री के कारण जिस महायशस्वी पुत्र को 14 वर्षों तक वन में रहने की आज्ञा देकर उसके भाई और उसकी पत्नी के साथ वन में भेज दिया है उस श्री राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण का तुम राज्य भोगने की इच्छा से कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते? जब भरद्वाज मुनि ने राजकुमार भरत से ऐसा कहा तो वह रोने लगे। उनकी आंखें भर आई और उन्होंने भरद्वाज से कहा, प्रभु ! अगर आप ऐसा समझते हैं तब तो मैं हर तरह से मारा गया। मैं निश्चित रूप से यह जानता हूं कि श्री राम के वनवास में मेरी ओर से कोई अपराध नहीं हुआ।
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भरद्वाज ने प्रसन्न होकर भरत क्या कहा-

इसलिए आप मुझे इस प्रकार की कठोर बातें ना कहें। मैं तो वन में इसलिए आया हूं ताकि अपने भाई श्री राम को प्रसन्न कर सकूं और उन्हें वापस अयोध्या लेकर के जा सकूँ। इसके बाद महर्षि वशिष्ठ ने भी भरद्वाज मुनि से कहा कि राजकुमार भरत का कोई अपराध नहीं है और आप इन पर प्रसन्न हो जाइए। तब भरद्वाज ने प्रसन्न होकर भरत से कहा कि तुम रघुकुल में उत्पन्न हुए हो। तुममें अपने गुरुओं की सेवा ,इंद्रियों का संयम और श्रेष्ठ पुरुषों के अनुकरण का भाव विराजमान है। तुम्हारे मन में जो बात है उसे मैं जानता हूं और तुम्हारी कीर्ति का अवश्य ही विस्तार होगा। 

मैं सीता, लक्ष्मण और धर्म को धारण करने वाले प्रभु श्री राम का पता जानता हूं। तुम्हारे बड़े भाई श्री रामचंद्र महापर्वत चित्रकूट पर निवास कर रहे हैं। अब तुम कल उस स्थान की यात्रा करना। आज अपने मंत्रियों के साथ मेरे आश्रम में ही निवास करो और मेरी अभिलाषा को पूर्ण करो। तब जिनके स्वरूप एवं स्वभाव का परिचय मिल गया था उन उदार दृष्टि वाले भरत ने मुनि की आज्ञा को शिरोधार्य किया और राजकुमार ने उस समय रात को उस आश्रम में ही निवास करने का विचार किया।
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