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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 116: किस राक्षस के डर से तपस्वी मुनियों ने छोड़ा श्री राम का आश्रम?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Thu, 11 Jul 2024 01:44 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 116: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- जकुमार भरत ने श्री राम की चरण पादुका को स्थापित करके राज्य का संचालन शुरू कर दिया।

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 116
Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 116- फोटो : jeevanajali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 116: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- जकुमार भरत ने श्री राम की चरण पादुका को स्थापित करके राज्य का संचालन शुरू कर दिया। भरत के लौट जाने पर श्रीरामचन्द्रजी उन दिनों जब वन में निवास करने लगे, तब उन्होंने देखा कि वहाँ के तपस्वी उद्विग्न हो वहाँ से अन्यत्र चले जाने के लिये उत्सुक हैं। पहले चित्रकूट के उस आश्रम में जो तपस्वी श्रीराम का आश्रय लेकर सदा आनन्दमग्न रहते थे, उन्हीं को श्रीराम ने उत्कण्ठित देखा। 
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उनकी उत्कण्ठा देख श्रीरामचन्द्रजी के मन में यह शङ्का हुई कि मुझसे कोई अपराध तो नहीं बन गया। तब वे हाथ जोड़कर वहाँ के कुलपति महर्षि से इस प्रकार बोले, क्या मुझमें पूर्ववर्ती राजाओं का-सा कोई बर्ताव नहीं दिखायी देता अथवा मुझमें कोई विकृत भाव दृष्टिगोचर होता है?

तपस्वी मुनियों ने छोड़ा श्री राम का आश्रम?

क्या सीता इस समय मेरी सेवा में लग जाने के कारण एक गृहस्थ की सती नारी के अनुरूप ऋषियों की समुचित सेवा नहीं कर पाती है?श्रीराम के इस प्रकार पूछने पर एक महर्षि जो जरावस्था के कारण तो वृद्ध थे ही, तपस्या द्वारा भी वृद्ध हो गये थे वो राम से बोले, जो स्वभाव से ही कल्याणमयी है और सदा सबके कल्याण में ही रत रहती है, वह विदेहनन्दिनी सीता विशेषतः तपस्वीजनों के प्रति बर्ताव करते समय अपने कल्याणमय स्वभाव से विचलित हो जाय, यह कैसे सम्भव है? 
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यहाँ वनप्रान्त में रावण का छोटा भाई खर नामक राक्षस है, जिसने जनस्थान में रहने वाले समस्त तापसों को उखाड़ फेंका है। वह बड़ा ही ढीठ, विजयोन्मत्त, क्रूर, नरभक्षी और घमंडी है। वह आपको भी सहन नहीं कर पाता है। जब से आप इस आश्रम में रह रहे हैं, तबसे सब राक्षस तापसों को विशेष रूप से सताने लगे हैं। वो पापजनक अपवित्र पदार्थों से तपस्वियों का स्पर्श कराकर अपने सामने खड़े हुए अन्य ऋषियों को भी पीड़ा देते हैं। 

किस मुनि का लिया सहारा ! 

वे दुष्ट राक्षस तपस्वियों की शारीरिक हिंसा का प्रदर्शन करें, इसके पहले ही हम इस आश्रम को त्याग देंगे। थोड़ी ही दूरपर एक विचित्र वन है, जहाँ फल-मूलकी अधिकता है। वहीं अश्वमुनिका आश्रम है, हम वही जा रहे है। खर आपके प्रति भी कोई अनुचित बर्ताव करे, उसके पहले ही यदि आपका विचार हो तो हमारे साथ ही यहाँ से चल दीजिये। 

तत्पश्चात् वे कुलपति महर्षि श्रीरामचन्द्रजी का अभिनन्दन करके उनसे पूछकर और उन्हें सान्त्वना देकर इस आश्रम को छोड़ वहाँ से अपने दल के ऋषियों के साथ चले गये। श्रीरामचन्द्रजी वहाँ से जाने वाले ऋषियों के पीछे पीछे जाकर उन्हें विदा दे कुलपति ऋषि को प्रणाम करके लौट आये। जिनका ऋषियों के समान ही चरित्र था, उन श्रीरामचन्द्रजी में निश्चय ही ऋषियों की रक्षा की शक्तिरूप गुण विद्यमान है। ऐसा विश्वास रखने वाले कुछ तपस्वीजनों ने उस आश्रम और राम का साथ नहीं छोड़ा।
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