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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 115: राजकुमार भरत ने श्री राम की चरण पादुकाओं को कहां रखा था ?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Wed, 10 Jul 2024 06:17 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 115: वाल्मीकि रामायण इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- जब राजकुमार भरत अयोध्या वापिस आते है तो सूनी अयोध्या को देखकर वो शोक करने लगते है।

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 115
Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 115- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 115: वाल्मीकि रामायण इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- जब राजकुमार भरत अयोध्या वापिस आते है तो सूनी अयोध्या को देखकर वो शोक करने लगते है। उन्हें अपने पिता और श्री राम के बिना नगरी अच्छी नहीं लग रही थी। तदनन्तर सब माताओं को अयोध्या में रखकर दृढप्रतिज्ञ भरत ने शोक से संतप्त हो गुरुजनों से इस प्रकार कहा, मैं नन्दिग्राम को जाऊँगा, इसके लिये आप सब लोगों की आज्ञा चाहता हूँ। मैं इस राज्य के लिये वहाँ श्रीराम की प्रतीक्षा करता रहूँगा। महात्मा भरत का यह शुभ वचन सुनकर सब मन्त्री और पुरोहित प्रसन्न हुए और भरत का गुणगान करने लगे। 
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मन्त्रियों का अपनी रुचि के अनुरूप प्रिय वचन सुनकर भरत ने सारथि से कहा, मेरा रथ जोतकर तैयार किया जाए। फिर उन्होंने प्रसन्नवदन होकर सब माताओं से बातचीत करके जाने की आज्ञा ली। इसके बाद शत्रुघ्न के सहित श्रीमान् भरत रथ पर सवार हुए। आगे-आगे वसिष्ठ आदि सभी गुरुजन एवं ब्राह्मणचल रहे थे। भरत के प्रस्थित होने पर हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई सारी सेना भी बिना बुलाये ही उनके पीछे पीछे चल दी और समस्त पुरवासी भी उनके साथ हो लिये। भरत अपने मस्तक पर भगवान् श्रीराम की चरणपादुका लिये रथ पर बैठकर बड़ी शीघ्रता से नन्दिग्राम की ओर चले। 

नन्दिग्राम में शीघ्र पहुँचकर भरत ने कहा, मेरे भाई ने यह उत्तम राज्य मुझे धरोहर के रूप में दिया है, उनकी ये सुवर्ण विभूषित चरणपादुकाएँ ही सबके योग क्षेम का निर्वाह करने वाली हैं। तत्पश्चात् भरत ने मस्तक झुकाकर उन चरणपादुकाओं के प्रति उस धरोहर रूप राज्य को समर्पित कर दिया। मन्त्री, सेनापति और प्रजा से भरत बोले, आप सब लोग इन चरणपादुकाओं के ऊपर छत्र धारण करें। मैं इन्हें आर्य रामचन्द्रजी के साक्षात् चरण मानता हूँ। मैं वनवास पूरा होने के बाद स्वयं इन पादुकाओं को पुनः शीघ्र ही श्री रघुनाथजी के चरणों से संयुक्त करके इन पादुकाओं से सुशोभित श्रीराम के उन युगल चरणों का दर्शन करूँगा। 
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इस प्रकार दीनभाव से विलाप करते हुए दुःखमग्न महायशस्वी भरत मन्त्रियों के साथ नन्दिग्राम में रहकर राज्य का शासन करने लगे। सेनासहित प्रभावशाली धीर-वीर भरत ने उस समय वल्कल और जटा धारण करके मुनिवेषधारी हो नन्दिग्राम में निवास किया। भरतजी राज्य-शासनका समस्त कार्य भगवान् श्रीराम की चरणपादुकाओं को निवेदन करके करते थे तथा स्वयं ही उनके ऊपर छत्र लगाते और चँवर डुलाते थे। बड़े भाई की उन पादुकाओं को राज्य पर अभिषिक्त करके सदा उनके अधीन रहकर उन दिनों राज्य का सब कार्य मन्त्री आदि से कराते थे। 

उस समय जो कोई भी कार्य उपस्थित होता, जो भी बहुमूल्य भेंट आती, वह सब पहले उन पादुकाओं को निवेदन करके पीछे भरत जी उसका यथावत् प्रबन्ध करते थे।
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