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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 113: भरत ने वापिस अयोध्या के लिए किया प्रस्थान! जानिए आगे क्या हुआ

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Tue, 09 Jul 2024 01:54 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 113: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आने वाले सर्ग में क्या हुआ- राजकुमार भरत ने श्री राम की चरण पादुका को लेकर राज्य करने का निर्णय किया।

Valmiki Ramayana
Valmiki Ramayana- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 113: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आने वाले सर्ग में क्या हुआ- राजकुमार भरत ने श्री राम की चरण पादुका को लेकर राज्य करने का निर्णय किया। उन्होंने यह भी निर्णय लिया कि जब तक श्री राम वनवास पूर्ण करके वापिस नहीं आ जाते तो कुटिया में ही निवास करेंगे। इसके बाद, श्रीरामचन्द्रजी की दोनों चरणपादुकाओं को अपने मस्तक पर रखकर भरत शत्रुघ्न के साथ प्रसन्नता-पूर्वक रथ पर बैठे। 
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वसिष्ठ, वामदेव तथा दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करने वाले जाबालि आदि सब मन्त्री, जो उत्तम मन्त्रणा देने के कारण सम्मानित थे, आगे-आगे चले। उस समय भरत अपनी सेना के साथ सहस्रों प्रकार के रमणीय धातुओं को देखते हुए चित्रकूट के किनारे से होकर निकले और उन्हें भरद्वाज मुनि का आश्रम दिखाई दिया। 
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भरत महर्षि भरद्वाज के आश्रम पहुंचे भरत Bharat Reached The Ashram Of Maharishi Bharadwaj

भरत महर्षि भरद्वाज के उस आश्रमपर पहुँचकर रथ से उतर पड़े और उन्होंने मुनि के चरणों में प्रणाम किया। महर्षि भरद्वाज ने पूछा, क्या तुम्हारा कार्य सम्पन्न हुआ? क्या श्रीरामचन्द्रजी से भेंट हुई? धर्मवत्सल भरत बोले,  श्रीराम अपने पराक्रम पर दृढ़ रहने वाले हैं। मैंने उनसे बहुत प्रार्थना की। गुरुजी ने भी अनुरोध किया तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर गुरुदेव वसिष्ठजी से इस प्रकार कहा, मैं चौदह वर्षों तक वन में रहूँ, इसके लिये मेरे पिताजी ने जो प्रतिज्ञा कर ली थी, उनकी उस प्रतिज्ञा का ही मैं यथार्थ रूप से पालन करूँगा। 

भरद्वाज ने क्यों की भरत की तारीफ़? Why did Bhardwaj praise India?

श्रीरघुनाथजी ने अयोध्या के राज्य का संचालन करने के लिये ये दोनों स्वर्णभूषित पादुकाएँ मुझे दे दीं। मैं महात्मा श्रीराम की आज्ञा पाकर लौट आया हूँ और उनकी इन मङ्गलमयी चरणपादुकाओं को लेकर अयोध्या को ही जा रहा हूँ। महात्मा भरत का यह शुभ वचन सुनकर भरद्वाज मुनि प्रसन्न हुए। उन्होंने राजकुमार भरत से कहा, तुम मनुष्यों में सिंह के समान वीर तथा शील और सदाचार के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ हो। जैसे जल नीची भूमि वाले जलाशय में सब ओर से बहकर चला आता है, उसी प्रकार तुममें सारे श्रेष्ठ गुण स्थित हों यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तदनन्तर श्रीमान् भरत बारंबार भरद्वाज मुनि की परिक्रमा करके मन्त्रियों सहित अयोध्या की ओर चल दिये। 

उन सब लोगों ने तरंगमालाओं से सुशोभित दिव्य नदी यमुना को पार करके पुनः शुभसलिला गङ्गाजी का दर्शन किया। फिर बन्धु-बान्धवों और सैनिकों के साथ मनोहर जल से भरी हुई गङ्गा के भी पार होकर वे परम रमणीय शृङ्गवेरपुर में जा पहुँचे। शृङ्गवेरपुर से प्रस्थान करने पर उन्हें पुनः अयोध्यापुरी का दर्शन हुआ।
 
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