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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 109: पाप कर्म के तीन प्रकार कौन से हैं? राम ने दिया ये उत्तर!

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Thu, 04 Jul 2024 03:15 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 109: वाल्मीकि रामायण के इस  लेख में हम आपको बजाते है की आगे क्या हुआ- जाबालि अपने तर्को से श्री राम को समझाते है कि आपको अयोध्या का राजा बन जाना चाहिए।

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 109
Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 109- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 109: वाल्मीकि रामायण के इस  लेख में हम आपको बजाते है की आगे क्या हुआ- जाबालि अपने तर्को से श्री राम को समझाते है कि आपको अयोध्या का राजा बन जाना चाहिए। इसके बाद, जाबालि का यह वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी ने अपनी संशयरहित बुद्धि के द्वारा श्रुतिसम्मत सदुक्ति का आश्रय लेकर कहा, आपने मेरा प्रिय करने की इच्छा से यहाँ जो बात कही है, वह कर्तव्य-सी दिखायी देती है, किंतु वास्तव में करने योग्य नहीं है। 
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जो पुरुष धर्म अथवा वेद की मर्यादा को त्याग देता है, वह पापकर्म में प्रवृत्त हो जाता है। उसके आचार और विचार दोनों भ्रष्ट हो जाते हैं, इसलिये वह सत्पुरुषों में कभी सम्मान नहीं पाता है। आचार ही यह बताता है कि कौन पुरुष उत्तम कुल में उत्पन्न हुआ है और कौन अधम कुल में, कौन वीर है और कौन व्यर्थ ही अपने को पुरुष मानता है तथा कौन पवित्र है और कौन अपवित्र? 

आपका उपदेश चोला तो धर्म का पहने हुए है, किंतु वास्तव में अधर्म है। इससे संसार में वर्ण संकरता का प्रचार होगा। यदि मैं इसे स्वीकार करके वेदोक्त शुभकर्मों का अनुष्ठान छोड़ दूँ और विधिहीन कर्मों में लग जाऊँ तो कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान रखने वाला कौन समझदार मनुष्य मुझे श्रेष्ठ समझकर आदर देगा? आपके बताये हुए मार्ग से चलने पर पहले तो मैं स्वेच्छाचारी हूँगा। फिर यह सारा लोक स्वेच्छाचारी हो जायगा, क्योंकि राजाओं के जैसे आचरण होते हैं, प्रजा भी वैसा ही आचरण करने लगती है। 
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जगत् में सत्य ही ईश्वर है। सदा सत्य के ही आधार पर धर्म की स्थिति रहती है। सत्य ही सबकी जड़ है। सत्य से बढ़कर दूसरा कोई परम पद नहीं है। मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ और सत्य की शपथ खाकर पिता के सत्य का पालन स्वीकार कर चुका हूँ, ऐसी दशा में मैं पिता के आदेश का किसलिये पालन नहीं करूँ? जो अपनी प्रतिज्ञा झूठी करने के कारण धर्म से भ्रष्ट हो जाता है, उस चञ्चल चित्तवाले पुरुष के दिये हुए हव्य-कव्य को देवता और पितर नहीं स्वीकार करते हैं। 

मनुष्य अपने शरीरसे जो पाप करता है, उसे पहले मनके द्वारा कर्तव्यरूप से निश्चित करता है। फिर जिह्वा की सहायता से उस अनृत कर्म (पाप) को वाणी द्वारा दूसरों से कहता है, तत्पश्चात् औरों के सहयोगसे उसे शरीर द्वारा सम्पन्न करता है। इस तरह एक ही पातक कायिक, वाचिक और मानसिक भेद से तीन प्रकार का होता है। मैं पिताजी के सामने इस तरह वन में रहने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। अब उनकी आज्ञा का उल्लङ्घन करके मैं भरत की बात कैसे मान लूंगा?

मैं वन में ही रहकर बाहर-भीतर से पवित्र हो नियमित भोजन करूँगा और पवित्र फल, मूल एवं पुष्पों द्वारा देवताओं और पितरों को तृप्त करता हुआ प्रतिज्ञा का पालन करूँगा। श्री राम की इस प्रकार धर्म युक्त बातें सुनकर जाबालि को प्रसन्नता हुई और उसने श्री राम को प्रणाम किया।
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