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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 108: ब्राह्मणशिरोमणि जाबालि ने श्री राम के शोक को अनुचित क्यों बताया ?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Wed, 03 Jul 2024 05:54 PM IST
सार

Valmiki Ramayana, Ayodhyakand, Sarga 108: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- श्री राम ने भरत को आदेश दिया कि अब तुम पिता के राज्य की रक्षा करो और मैं भी दण्डक वन को प्रस्थान कर जाऊँगा।

ram jii
ram jii- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana, Ayodhyakand, Sarga 108: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- श्री राम ने भरत को आदेश दिया कि अब तुम पिता के राज्य की रक्षा करो और मैं भी दण्डक वन को प्रस्थान कर जाऊँगा। ऐसा कहकर श्री राम चुप हो गए। जब धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी भरत को इस प्रकार समझा-बुझा रहे थे, उसी समय ब्राह्मणशिरोमणि जाबालि ने उनसे एक धर्म विरुद्ध वचन कहा। वो बोले, संसार में कौन पुरुष किसका बन्धु है और किससे किसको क्या पाना है? जीव अकेला ही जन्म लेता और अकेला ही नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य माता या पिता समझकर किसी के प्रति आसक्त होता है, उसे पागल के समान समझना चाहिये। 
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जैसे कोई मनुष्य दूसरे गाँव को जाते समय बाहर किसी धर्मशाला में एक रात के लिये ठहर जाता है और दूसरे दिन उस स्थान को छोड़कर आगे के लिये प्रस्थित हो जाता है, इसी प्रकार पिता, माता, घर और धन। ये मनुष्यों के आवास मात्र हैं। सज्जन पुरुष इसमें आसक्त नहीं हो सकता है। आपको पिता का राज्य छोड़कर इस दुःखमय, नीचे-ऊँचे तथा बहुकण्टकाकीर्ण वन के कुत्सित मार्ग पर नहीं चलना चाहिये। जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में विहार करते हैं, उसी प्रकार आप बहुमूल्य राजभोगों का उपभोग करते हुए अयोध्या विहार कीजिये। राजा दशरथ आपके कोई नहीं थे और आप भी उनके कोई नहीं हैं। राजा दूसरे थे और आप भी दूसरे हैं; इसलिये मैं जो कहता हूँ, वही कीजिये। 

पिता जीव के जन्म में निमित्त कारण मात्र होता है। वास्तव में ऋतुमती माता के द्वारा गर्भ धारण किये हुए वीर्य और रज का परस्पर संयोग होने पर ही पुरुष का यहाँ जन्म होता है। जो मनुष्य प्राप्त हुए अर्थ का परित्याग करके धर्मपरायण हुए हैं, उन्हीं-उन्हीं के लिये मैं शोक करता हूँ, दूसरों के लिये नहीं। वे इस जगत् में धर्म के नाम पर केवल दुःख भोगकर मृत्यु के पश्चात् नष्ट हो गये हैं। देवताओं के लिये यज्ञ और पूजन करो, दान दो, यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करो, तपस्या करो और घर-द्वार छोड़कर संन्यासी बन जाओ इत्यादि बातें बताने वाले ग्रन्थ बुद्धिमान् मनुष्यों ने दान की ओर लोगों की प्रवृत्ति कराने के लिये ही बनाये हैं। 
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आप अपने मन में यह निश्चय कीजिये कि इस लोक के सिवा कोई दूसरा लोक नहीं है। जो प्रत्यक्ष राज्यलाभ है, उसका आश्रय लीजिये। सत्पुरुषों की बुद्धि, जो सब लोगों के लिये राह दिखाने वाली होने के कारण प्रमाणभूत है, आगे करके भरत के अनुरोध से आप अयोध्या का राज्य ग्रहण कीजिये।
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