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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 107: पुत्र शब्द का अर्थ क्या है ? किस नरक से रक्षा करता है पुत्र ? राम ने

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Wed, 03 Jul 2024 05:06 AM IST
सार

 Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 107: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि श्री राम के आगे एक प्रकार से धर्म संकट खड़ा हो गया। दरअसल एक तरफ उनके पिता का वन में रहने का आदेश था वही दूसरी ओर अपने छोटे भाई का मार्मिक निवेदन था।

वाल्मीकि रामायण
वाल्मीकि रामायण- फोटो : jeevanjali

विस्तार


 Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 107: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि श्री राम के आगे एक प्रकार से धर्म संकट खड़ा हो गया। दरअसल एक तरफ उनके पिता का वन में रहने का आदेश था वही दूसरी ओर अपने छोटे भाई का मार्मिक निवेदन था। राजकुमार भरत ने श्री राम से कहा कि आपके बिना अयोध्या सूनी है और आपको मेरे साथ चलना ही होगा। जब भरत पुनः इस प्रकार प्रार्थना करने लगे, तब कुटुम्बीजनों के बीच में सत्कारपूर्वक बैठे हुए लक्ष्मण के बड़े भाई श्रीमान् रामचन्द्रजी ने उन्हें उत्तर देते हुए कहा, तुम नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथ के द्वारा केकयराज कन्या माता कैकेयी के गर्भसे उत्पन्न हुए हो, अतः तुमने जो ऐसे उत्तम वचन कहे हैं, वे सर्वथा तुम्हारे योग्य हैं।
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पिताजी का जब तुम्हारी माताजी के साथ विवाह हुआ था, तभी उन्होंने तुम्हारे नाना से कैकेयी के पुत्र को राज्य देने की उत्तम शर्त कर ली थी। इसके बाद देवासुर-संग्राम में तुम्हारी माता ने प्रभावशाली महाराज की बड़ी सेवा की, इससे संतुष्ट होकर राजा ने उन्हें वरदान दिया। उसी की पूर्ति के लिये प्रतिज्ञा कराकर तुम्हारी श्रेष्ठ वर्णवाली यशस्विनी माता ने उन नरश्रेष्ठ पिताजी से दो वर माँगे। एक वर के द्वारा इन्होंने तुम्हारे लिये राज्य माँगा और दूसरे के द्वारा मेरा वनवास। इनसे इस प्रकार प्रेरित होकर राजा ने वे दोनों वर इन्हें दे दिये। 

यही कारण है कि मैं सीता और लक्ष्मण के साथ इस निर्जन वन में चला आया हूँ। यहाँ मेरा कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। मैं यहाँ पिताजी के सत्य की रक्षा में स्थित रहूँगा। तुम भी उनकी आज्ञा मानकर शीघ्र ही राज्य पद पर अपना अभिषेक करा लो और पिता को सत्यवादी बनाओ। तुम मेरे लिये पूज्य पिता राजा दशरथ को कैकेयी के ऋण से मुक्त करो, उन्हें नरक में गिरने से बचाओ और माता का भी आनन्द बढ़ाओ। बेटा पुत् नामक नरक से पिता का उद्धार करता है, इसलिये वह पुत्र कहा गया है। वही पुत्र है, जो पितरों की सब ओर से रक्षा करता है। 
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बहुत-से गुणवान् और बहुश्रुत पुत्रों की इच्छा करनी चाहिये। सम्भव है कि प्राप्त हुए उन पुत्रों में से कोई एक भी गया की यात्रा करे। तुम शत्रुघ्न तथा समस्त ब्राह्मणों को साथ लेकर अयोध्या को लौट जाओ और प्रजा को सुख दो। अब मैं भी लक्ष्मण और सीता के साथ शीघ्र ही दण्डकारण्य में प्रवेश करूँगा। सूर्य की प्रभा को तिरोहित कर देने वाला छत्र तुम्हारे मस्तक पर शीतल छाया करे। अब मैं भी धीरे-धीरे इन जंगली वृक्षों की घनी छाया का आश्रय लूँगा। हम चारों पुत्र अपने पिता राजा दशरथ के सत्य की रक्षा करें। तुम विषाद मत करो।

 
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