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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 105 : राजकुमार भरत ने श्री राम से किया राजा बनने का आग्रह !

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Tue, 02 Jul 2024 12:08 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 105 : वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि माता कौसल्या ने जब श्री राम और सीता को देखा तो वो शोक में डूब गई। इसके बाद, अपने सुहृदों से घिरकर बैठे हुए

रामायण
रामायण- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand Sarga 105 : वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि माता कौसल्या ने जब श्री राम और सीता को देखा तो वो शोक में डूब गई। इसके बाद, अपने सुहृदों से घिरकर बैठे हुए पुरुषसिंह श्रीराम आदि भाइयों की वह रात्रि पिताकी मृत्यु के दुःख से शोक करते हुए ही व्यतीत हुई। सबेरा होने पर भरत आदि तीनों भाई सुहृदों के साथ ही मन्दाकिनी के तटपर गये और स्नान, होम एवं जप आदि करके पुनः श्रीराम के पास लौट आये। इसके बाद भरत ने श्री राम से कहा, पिताजीने वरदान देकर मेरी माता को संतुष्ट कर दिया और माता ने यह राज्य मुझे दे दिया। अब मैं अपनी ओर से यह अकण्टक राज्य आपकी ही सेवा में समर्पित करता हूँ। आप इसका पालन एवं उपभोग कीजिये। 
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भगवान राम ने भरत को दी सांत्वना

तब शिक्षित बुद्धिवाले अत्यन्त धीर भगवान् श्रीरामने यशस्वी भरत को इस तरह दुःखी हो विलाप करते देख उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा, यह जीव ईश्वर के समान स्वतन्त्र नहीं है, अतः कोई यहाँ अपनी इच्छा के अनुसार कुछ नहीं कर सकता। काल इस पुरुष को इधर-उधर खींचता रहता है। जो रात बीत जाती है, वह लौटकर फिर नहीं आती है। जैसे यमुना जल से भरे हुए समुद्र की ओर जाती ही है, उधर से लौटती नहीं। जैसे महासागर में बहते हुए दो काठ कभी एक दूसरे से मिल जाते हैं और कुछ काल के बाद अलग भी हो जाते हैं, उसी प्रकार स्त्री, पुत्र, कुटुम्ब और धन भी मिलकर बिछुड़ जाते हैं। क्योंकि इनका वियोग अवश्यम्भावी है। 

भरत को अयोध्या जानें की भगवान राम ने दी सलाह 

इस संसार में कोई भी प्राणी यथा समय प्राप्त होने वाले जन्म-मरण का उल्लङ्घन नहीं कर सकता। इसलिये जो किसी मरे हुए व्यक्ति के लिये बारंबार शोक करता है, उसमें भी यह सामर्थ्य नहीं है कि वह अपनी ही मृत्यु को टाल सके। कोई भी ऐसा विद्वान्, जो तुम्हारे और मेरे समान शास्त्र-ज्ञान-सम्पन्न एवं परम बुद्धिमान् है, पिताजी के लिये शोक नहीं कर सकता। तुम यहाँ से जाकर अयोध्यापुरी में निवास करो। क्योंकि मन को वश में रखने वाले पूज्य पिताजी ने तुम्हारे लिये यही आदेश दिया है। उन पुण्यकर्मा महाराज ने मुझे भी जहाँ रहने की आज्ञा दी है, वहीं रहकर मैं उन पूज्य पिता के आदेश का पालन करूँगा।  मैं इस वनवासरूपी कर्म के द्वारा पिताजी के ही वचन का जो धर्मात्माओं को भी मान्य है, पालन करूँगा। परलोकपर विजय पाने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को धार्मिक, क्रूरता से रहित और गुरुजनों का आज्ञापालक होना चाहिये। सर्वशक्तिमान् महात्मा श्रीराम एक मुहूर्त तक अपने छोटे भाई भरत से पिताकी आज्ञा का पालन कराने के उद्देश्य से ये अर्थयुक्त वचन कहकर चुप हो गये।
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