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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 104:श्री राम और लक्ष्मण को देखकर शोक में क्यों डूब गई माता कौशल्या ! जानिए

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Tue, 02 Jul 2024 12:08 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 104: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि भरत और श्री राम का रुदन सुनकर अयोध्या वासी और सेना के लोग श्री राम से मिलने के लिए जाते है और श्री राम के दर्शन करते है।

वाल्मीकि रामायण
वाल्मीकि रामायण- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 104: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि भरत और श्री राम का रुदन सुनकर अयोध्या वासी और सेना के लोग श्री राम से मिलने के लिए जाते है और श्री राम के दर्शन करते है। इसके बाद, महर्षि वसिष्ठजी महाराज दशरथ की रानियों को आगे करके श्रीरामचन्द्रजी को देखने की अभिलाषा लिये उस स्थान की ओर चले, जहाँ उनका आश्रम था। राजरानियाँ मन्द गति से चलती हुई जब मन्दाकिनी के तट पर पहुँची, तब उन्होंने वहाँ श्रीराम और लक्ष्मण के स्नान करने का घाट देखा। इस समय कौसल्या के मुँह पर आँसुओं की धारा बह चली।  
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आगे जाकर विशाललोचना  कौशल्या ने देखा कि श्रीराम ने पृथ्वी पर बिछे हुए दक्षिणाग्र कुशों के ऊपर अपने पिता के लिये पिसे हुए इङ्गदी के फल का पिण्ड रख छोड़ा है। दुःखी राम के द्वारा पिता के लिये भूमि पर रखे हुए उस पिण्ड को देखकर देवी कौसल्या ने दशरथ की सब रानियों से कहा, श्रीराम ने इक्ष्वाकुकुल के स्वामी रघुकुलभूषण महात्मा पिता के लिये यह विधिपूर्वक पिण्डदान किया है। 

शोक से आर्त हुई  कौशल्या  को उस समय उनकी सौतें समझा-बुझाकर उन्हें आगे ले गयीं। आश्रम पर पहुँचकर उन सबने श्रीराम को देखा, जो स्वर्ग से गिरे हुए देवता के समान जान पड़ते थे। भोगों का परित्याग करके तपस्वी जीवन व्यतीत करने वाले श्रीराम को देखकर उनकी माताएँ शोक से कातर हो गयी और आर्तभाव से फूट-फूटकर रोती हुई आँसू बहाने लगीं। सत्यप्रतिज्ञ नरश्रेष्ठ श्रीराम माताओं को देखते ही उठकर खड़े हो गये और बारी-बारी से उन सबके चरणारविन्दों का स्पर्श किया। 
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विशाल नेत्रों वाली माताएँ स्नेहवश जिनकी अंगुलियाँ कोमल और स्पर्श सुखद था, उन सुन्दर हाथों से श्रीराम की पीठ से धूल पोंछने लगीं। श्रीराम के बाद लक्ष्मण भी उन सभी दुःखिया माताओं को देखकर दुःखी हो गये और उन्होंने स्नेहपूर्वक धीरे-धीरे उनके चरणों में प्रणाम किया। उन सब माताओं ने श्रीराम के साथ जैसा बर्ताव किया था, वैसे ही उत्तम लक्षणों से युक्त दशरथनन्दन लक्ष्मण के साथ भी किया। दुःख से पीड़ित हई कौसल्या ने जैसे माता अपनी बेटी को हृदय से लगा लेती है, उसी प्रकार वनवास के कारण दीन (दुर्बल) हुई सीता को छाती से चिपका लिया। 

श्रीराम ने वसिष्ठजी के चरणों में पड़कर उन्हें दोनों हाथों से पकड़ लिया। जैसे देवराज इन्द्र बृहस्पति के चरणों का स्पर्श करते हैं, उसी प्रकार अग्नि के समान बढ़े हुए तेजवाले पुरोहित वसिष्ठजी के दोनों पैर पकड़कर श्रीरामचन्द्रजी उनके साथ ही पृथ्वीपर बैठ गये। श्रीराम, महानुभाव लक्ष्मण तथा धर्मात्मा भरत—ये तीनों भाई अपने सुहृदों से घिरकर यज्ञशाला में सदस्यों द्वारा घिरे हुए त्रिविध अग्नियों के समान शोभा पा रहे थे।
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