विज्ञापन
Home  mythology  ram katha  valmiki ramayana ayodhya kand sarga 103 why did the land of chitrakoot mountain start making a terrible sound

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 103: प्रसंग चित्रकूट पर्वत का ? किस्सा श्री राम और अयोध्या की प्रजा का

jeevanjali Published by: कोमल Updated Mon, 01 Jul 2024 02:59 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 103: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि श्री राम जी ने अपने पिता के निधन का समाचार सुनकर मृत्यु के उपरांत किए जाने वाले संस्कार किए।

रामायण
रामायण- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 103: वाल्मीकि रामायण के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि श्री राम जी ने अपने पिता के निधन का समाचार सुनकर मृत्यु के उपरांत किए जाने वाले संस्कार किए। इसके बाद उसी मार्ग से मन्दाकिनी तट के ऊपर आकर पृथ्वीपालक पुरुषसिंह श्रीराम सुन्दर शिखर वाले चित्रकूट पर्वत पर चढ़े और पर्णकुटी के द्वार पर आकर भरत और लक्ष्मण दोनों भाइयों को दोनों हाथों से पकड़कर रोने लगे। सीतासहित रोते हुए उन चारों भाइयों के रुदन शब्द से उस पर्वत पर गरजते हुए सिंहों के दहाड़ने के समान प्रतिध्वनि होने लगी। 
विज्ञापन
विज्ञापन


पिताको जलाञ्जलि देकर रोते हुए उन महाबली भाइयों के रोदन का तुमुल नाद सुनकर भरत के सैनिक किसी भय की आशङ्का से डर गये। फिर उसे पहचानकर वे एक-दूसरे से बोले, निश्चय ही भरत श्री रामचन्द्रजी से मिले हैं। अपने परलोकवासी पिता के लिये शोक करने वाले उन चारों भाइयों के रोने का ही यह महान् शब्द है। यों कहकर उन सबने अपनी सवारियों को तो वहीं छोड़ दिया और जिस स्थान से वह आवाज आ रही थी, उसी ओर मुँह किये एकचित्त होकर वे दौड़ पड़े। 

उनसे भिन्न जो सुकुमार मनुष्य थे, उनमें से कुछ लोग घोड़ों से, कुछ हाथियों से और कुछ सजे-सजाये रथों से ही आगे बढ़े। कितने ही मनुष्य पैदल ही चल दिये। यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी को परदेश में आये अभी थोड़े ही दिन हुए थे, तथापि लोगों को ऐसा जान पड़ता था कि मानो वे दीर्घकाल से परदेश में रह रहे हैं; अतः सब लोग उनके दर्शन की इच्छा से सहसा आश्रम की ओर चल दिये। वे लोग चारों भाइयों का मिलन देखने की इच्छा से खुरों एवं पहियों से युक्त नाना प्रकार की सवारियों द्वारा बड़ी उतावली के साथ चले। 
विज्ञापन


अनेक प्रकार की सवारियों तथा रथ की पहियों से आक्रान्त हुई वह भूमि भयंकर शब्द करने लगी, ठीक उसी तरह जैसे मेघों की घटा घिर आने पर आकाश में गड़गड़ाहट होने लगती है। लोगों ने सहसा पहुँचकर देखा कि यशस्वी, पापरहित, पुरुषसिंह श्रीराम वेदी पर बैठे हैं। रीराम के पास जाने पर सबके मुख आँसुओं से भीग गये और सब लोग मन्थरासहित कैकेयी की निन्दा करने लगे। श्रीराम ने कुछ मनुष्यों को वहाँ छाती से लगाया तथा कुछ लोगों ने पहुँचकर वहाँ उनके चरणों में प्रणाम किया। राजकुमार श्रीराम ने उस समय वहाँ आये हुए सभी मित्रों और बन्धु-बान्धवों का यथायोग्य सम्मान किया। 

उस समय वहाँ रोते हुए उन महात्माओं का वह रोदन-शब्द पृथ्वी, आकाश, पर्वतों की गुफा और सम्पूर्ण दिशाओं को निरन्तर प्रतिध्वनित करता हुआ मृदङ्गकी ध्वनि के समान सुनायी पड़ता था।
विज्ञापन