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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 103: दशरथ की मृत्यु का समाचार सुनकर शोक में डूब गए श्री राम!

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Fri, 28 Jun 2024 05:09 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 103: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- कि श्री राम को जब राजकुमार भरत अपने पिता के निधन का समाचार देते है तो श्री राम व्याकुल हो जाते है।

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 103:
Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 103:- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 103: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- कि श्री राम को जब राजकुमार भरत अपने पिता के निधन का समाचार देते है तो श्री राम व्याकुल हो जाते है। श्री राम ने भरत से कहा, महाराज दशरथ से हीन हुई अयोध्या अब प्रधान शासक से रहित हो अस्वस्थ एवं आकुल हो उठी है; अतः वनवास से लौटने पर भी मेरे मन में अयोध्या जाने का उत्साह नहीं रह गया है। वनवास की अवधि समाप्त करके यदि मैं अयोध्या में जाऊँ तो फिर कौन मुझे कर्तव्य का उपदेश देगा, क्योंकि पिताजी तो परलोकवासी हो गये। 
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पृथ्वीपति पिताजी के लिये जलाञ्जलि दान

भरत से ऐसा कहकर शोकसंतप्त श्री रामचन्द्र जी पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली अपनी पत्नी के पास आकर बोले, सीते ! तुम्हारे श्वशुर चल बसे। लक्ष्मण ! तुम पितृहीन हो गये। भरत पृथ्वीपति महाराज दशरथ के स्वर्गवास का दुःखदायी समाचार सुना रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर उन सभी यशस्वी कुमारों के नेत्रों में बहुत अधिक आँसू उमड़ आये। तदनन्तर सभी भाइयों ने दुःखी हुए श्रीरामचन्द्रजी को सान्त्वना देते हुए कहा, भैया ! अब पृथ्वीपति पिताजी के लिये जलाञ्जलि दान कीजिये। 

श्रीराम ने अत्यन्त दुःखी होकर लक्ष्मण ने क्या कहा

अपने श्वशुर महाराज दशरथ के स्वर्गवास का समाचार सुनकर सीता के नेत्रों में आँसू भर आये। वे अपने प्रियतम श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख न सकीं। तदनन्तर रोती हुई जनककुमारी को सान्त्वना देकर दुःखमग्न श्रीराम ने अत्यन्त दुःखी हुए लक्ष्मण से कहा, मैं महात्मा पिता को जलदान देने के लिये चलूँगा। श्रीराम के सुदृढ़ भक्त सुमन्त्र समस्त राजकुमारों के साथ श्रीराम को धैर्य बँधाकर उन्हें हाथ का सहारा दे कल्याणमयी मन्दाकिनी के तट पर ले गये।
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पृथ्वीपालक श्रीराम ने जल से भरी हुई अञ्जलि ले दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके कहा, महाराज दशरथ ! आज मेरा दिया हुआ यह निर्मल जल पितृलोक में गये हुए आपको अक्षय रूप से प्राप्त हो। इसके बाद मन्दाकिनीके जल से निकलकर किनारे पर आकर तेजस्वी श्रीरघुनाथजी ने अपने भाइयों के साथ मिलकर पिताके लिये पिण्डदान किया। उन्होंने इङ्गदी के गूदे में बेर मिलाकर उसका पिण्ड तैयार किया और बिछे हुए कुशों पर उसे रखकर अपने पिता को आहार दिया।
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