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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 102,103: राजकुमार भरत की किस बात को सुनकर विलाप करने लगे श्री राम !

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Thu, 27 Jun 2024 05:49 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 102,103: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे की कहानी में क्या हुआ- कि राजकुमार भरत ने श्री राम से अयोध्या वापिस चलने और राज्य संभालने की बात की जिसे राम ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया।

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga
Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 102,103: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे की कहानी में क्या हुआ- कि राजकुमार भरत ने श्री राम से अयोध्या वापिस चलने और राज्य संभालने की बात की जिसे राम ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि अपने पिता की आज्ञा का वो निरादर नहीं कर सकते है। इसके बाद, श्रीरामचन्द्रजी की बात सुनकर भरत ने कहा, मैं राज्य का अधिकारी न होने के कारण उस राजधर्म के अधिकार से रहित हूँ, अतः मेरे लिये यह राजधर्म का उपदेश किस काम आयगा? हमारे यहाँ सदा से ही इस शाश्वत धर्म का पालन होता आया है कि ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं हो सकता। आप मेरे साथ समृद्धिशालिनी अयोध्यापुरी को चलिये और हमारे कुल के अभ्युदय के लिये राजा के पद पर अपना अभिषेक कराइये। 
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अयोध्यापुरी को चलिये

यद्यपि सब लोग राजा को मनुष्य कहते हैं, तथापि मेरी राय में वह देवत्वपर प्रतिष्ठित है, क्योंकि उसके धर्म और अर्थयुक्त आचार को साधारण मनुष्य के लिये असम्भावित बताया गया है। जब मैं केकयदेश में था और आप वन में चले आये थे, तब अश्वमेध आदि यज्ञों के कर्ता और सत्पुरुषों द्वारा सम्मानित बुद्धिमान् महाराज दशरथ स्वर्गलोक को चले गये। सीता और लक्ष्मण के साथ आपके राज्य से निकलते ही दुःख-शोक से पीड़ित हुए महाराज स्वर्गलोक को चल दिये। 

श्रीरामचन्द्रजी दुःख के कारण अचेत

आपके पिता आप से विलग होते ही शोक के कारण रुग्ण हो गये और आपके ही शोक में मग्न हो, आपको ही देखने की इच्छा रखकर, आप में ही लगी हुई बुद्धि को आपकी ओर से न हटाकर, आपका ही स्मरण करते हुए स्वर्ग को चले गये। भरत की कही हुई पिता की मृत्यु से सम्बन्ध रखने वाली करुणाजनक बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी दुःख के कारण अचेत हो गये। रत के मुख से निकला हुआ वह वचन वज्र-सा लगा, मानो दानवशत्रु इन्द्र ने युद्धस्थल में वज्र का प्रहार-सा कर दिया हो। शोक के कारण दुर्बल हुए उन महा-धनुर्धर श्रीराम को सब ओर से घेरकर सीता सहित रोते हुए वे तीनों भाई आँसुओं के जल से भिगोने लगे। 
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थोड़ी देर बाद पुनः होश में आने पर नेत्रों से अश्रुवर्षा करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ने अत्यन्त दीन वाणी में विलाप आरम्भ किया। पृथ्वीपति महाराज दशरथ को स्वर्गगामी हुआ सुनकर धर्मात्मा श्रीराम ने भरत से कहा, जब पिताजी परलोकवासी हो गये, तब अयोध्या में चलकर अब मैं क्या करूँगा? उन राजशिरोमणि पिता से हीन हुई उस अयोध्या का अब कौन पालन करेगा? जो पिताजी मेरे ही शोक से मृत्यु को प्राप्त हुए, उन्हीं का मैं दाह-संस्कार तक न कर सका। मुझ जैसे व्यर्थ जन्म लेने वाले पुत्र से उन महात्मा पिता का कौन-सा कार्य सिद्ध हुआ?
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