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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 101: राजकुमार भरत ने राम से क्या विनती की? क्या राम ने उस विनती को स्वीकार

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Thu, 27 Jun 2024 12:43 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 101: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- श्री राम अपने छोटे भाई भरत को राजनीति की सीख देते है।

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 101
Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 101- फोटो : JEEVANJALI

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand sarga 101: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- श्री राम अपने छोटे भाई भरत को राजनीति की सीख देते है। इसके बाद, भरत ने बलपूर्वक आन्तरिक शोक को दबा पुनः हाथ जोड़कर इस प्रकार कहा, हमारे महाबाहु पिता अत्यन्त दुष्कर कर्म करके पुत्रशोक से पीड़ित हो हमें छोड़कर स्वर्गलोक को चले गये। अपनी स्त्री एवं मेरी माता कैकेयी की प्रेरणा से ही विवश हो पिताजी ने ऐसा कठोर कार्य किया था। मेरी माँ ने अपने सुयश को नष्ट करने वाला यह बड़ा भारी पाप किया है। वह राज्यरूपी फल न पाकर विधवा हो गयी। अब मेरी माता शोक से दुर्बल हो महाघोर नरक में पड़ेगी। 
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भरत ने ने श्रीरामचन्द्रजी के चरणों पर टेक माथा 

आप अपने दासस्वरूप मुझ भरत पर कृपा कीजिये और इन्द्र की भाँति आज ही राज्य ग्रहण करने के लिये अपना अभिषेक कराइये। आप ज्येष्ठ होने के नाते राज्य-प्राप्ति के क्रमिक अधिकार से युक्त हैं, न्यायतः आपको ही राज्य मिलना उचित है। अतः आप धर्मानुसार राज्य ग्रहण करें और अपने सुहृदों को सफल-मनोरथ बनावें। मैं इन समस्त सचिवों के साथ आपके चरणों में मस्तक रखकर यह याचना करता हूँ कि आप राज्य ग्रहण करें। मैं आपका भाई, शिष्य और दास हूँ आप मुझपर कृपा करें। ऐसा कहकर कैकेयी पुत्र महाबाहु भरत ने नेत्रों से आँसू बहाते हुए पुनः श्रीरामचन्द्रजी के चरणों से माथा टेक दिया। 

श्री राम ने दी आज्ञा

श्री राम बोले,  उत्तम कुल में उत्पन्न, सत्त्वगुणसम्पन्न, तेजस्वी और श्रेष्ठ व्रतों का पालन करने वाला मेरे-जैसा मनुष्य राज्य के लिये पिताकी आज्ञा का उल्लङ्घन रूप पाप कैसे कर सकता है। मैं तुम्हारे अंदर थोड़ा-सा भी दोष नहीं देखता। अज्ञानवश तुम्हें अपनी माताकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये।  गुरुजनों का अपनी अभीष्ट स्त्रियों और प्रिय पुत्रों पर सदा पूर्ण अधिकार होता है। वे उन्हें चाहे जैसी आज्ञा दे सकते हैं। मनुष्य की विश्ववन्द्य पिता में जितनी गौरव-बुद्धि होती है, उतनी ही माता में भी होनी चाहिये। इन धर्मशील माता और पिता दोनों ने जब मुझे वन में जाने की आज्ञा दे दी है, तब मैं उनकी आज्ञा के विपरीत दूसरा कोई बर्ताव कैसे कर सकता हूँ? 
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महाराज दशरथ बहुत लोगों के सामने हम दोनों के लिये इस प्रकार पृथक्-पृथक् दो आज्ञाएँ देकर स्वर्ग को सिधारे हैं। चौदह वर्षोंतक दण्डकारण्य में रहने के बाद ही महात्मा पिता के दिये हुए राज्य-भाग का मैं उपभोग करूँगा। मनुष्यलोक में सम्मानित और देवराज इन्द्र के तुल्य तेजस्वी मेरे महात्मा पिता ने मुझे जो वनवास की आज्ञा दी है, उसीको मैं अपने लिये परम हितकारी समझता हूँ। उनकी आज्ञा के विरुद्ध सर्वलोकेश्वर ब्रह्मा का अविनाशी पद भी मेरे लिये श्रेयस्कर नहीं है।
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