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Valmiki Ramayana Ayodhya Kand Sarga 100: श्री राम ने भरत से पूछे ये बड़े सवाल! उन सवालों में छुपा है राजनीति

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Sat, 22 Jun 2024 06:06 PM IST
सार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand Sarga 100: राजकुमार भरत श्री राम से मिलकर उनके चरणों में प्रणाम करते है और उन्ही दशा देखकर भरत जी की आंखों से आंसू बहने लगे। 

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand Sarga 100:
Valmiki Ramayana Ayodhya Kand Sarga 100:- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Valmiki Ramayana Ayodhya Kand Sarga 100: वाल्मीकि रामायण के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- राजकुमार भरत श्री राम से मिलकर उनके चरणों में प्रणाम करते है और उन्ही दशा देखकर भरत जी की आंखों से आंसू बहने लगे। फिर शत्रुघ्न ने भी रोते-रोते श्रीराम के चरणों में प्रणाम किया। श्रीराम ने उन दोनों को उठाकर छाती से लगा लिया। फिर वे भी नेत्रों से आँसुओं की धारा बहाने लगे। तत्पश्चात् राजकुमार श्रीराम तथा लक्ष्मण उस वन में सुमन्त्र और निषादराज गुह से मिले, मानो आकाश में सूर्य और चन्द्रमा, शुक्र और बृहस्पति से मिल रहे हों।
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श्रीराम ने भाई भरत से कही ये बड़ी बात

यूथपति गजराज पर बैठकर यात्रा करने योग्य उन चारों राजकुमारों को उस विशाल वन में आया देख समस्त वनवासी हर्ष छोड़कर शोक के आँसू बहाने लगे। श्रीराम ने भाई भरत को अपने हाथ से पकड़कर उठाया और उनका मस्तक सूंघकर उन्हें हृदय से लगा लिया। इसके बाद रघुकुलभूषण भरत को गोद में बिठाकर श्रीराम ने बड़े आदर से पूछा, पिताजी कहाँ थे कि तुम इस वन में आये हो? उनके जीते-जी तो तुम वन में नहीं आ सकते थे। महाराज जीवित हैं न? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि वे अत्यन्त दुःखी होकर सहसा परलोकवासी हो गये हों और इसीलिये तुम्हें स्वयं यहाँ आना पड़ा हो?

श्रीराम ने की भरत की तारीफ

तुम अभी बालक हो, इसलिये परम्परा से चला आता हुआ तुम्हारा राज्य नष्ट तो नहीं हो गया? क्या तुम सदा धर्म में तत्पर रहने वाले, विद्वान्, ब्रह्मवेत्ता और इक्ष्वाकुकुल के आचार्य महातेजस्वी वसिष्ठजी की यथावत् पूजा करते हो?क्या तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, पिता के समान आदरणीय वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणों का सम्मान करते हो? जैसे पवित्र याजक पतित यजमान का तथा स्त्रियाँ कामचारी पुरुष का तिरस्कार कर देती हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरता पूर्वक अधिक कर लेने के कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती?
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श्रीराम ने जताई शंका

तुमने जिसे राजदूत के पद पर नियुक्त किया है, वह पुरुष अपने ही देश का निवासी, विद्वान्, कुशल, प्रतिभाशाली और जैसा कहा जाय, वैसी ही बात दूसरे के सामने कहने वाला और सदसद्विवेकयुक्त है न? जिन शत्रुओं को तुमने राज्य से निकाल दिया है, वे यदि फिर लौटकर आते हैं तो तुम उन्हें दुर्बल समझकर उनकी उपेक्षा तो नहीं करते?  तुम कभी नास्तिक ब्राह्मणों का संग तो नहीं करते हो? क्योंकि वे बुद्धि को परमार्थ की ओर से विचलित करने में कुशल होते हैं तथा वास्तव में अज्ञानी होते हुए भी अपने को बहुत बड़ा पण्डित मानते हैं।

 
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