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Panchmukhi Shiv: भगवान शिव के क्यों है पांच मुख? जानिए इन 5 मुख का रहस्य

जीवांजलि धर्म डेस्कPublished by:
निधि
सार

Panchmukhi Shiv: भगवान् शिव के भक्तों के लिए सावन का महीना बेहद पवित्र माह होता है। इस पूरे महीनें शिव की सेवा करने से शिव लोक की प्राप्ति हो जाती है।

Panchmukhi Shiv
Panchmukhi Shiv: भगवान् शिव के भक्तों के लिए सावन का महीना बेहद पवित्र माह होता है। इस पूरे महीनें शिव की सेवा करने से शिव लोक की प्राप्ति हो जाती है। इस बार सावन की शुरुआत और अंत दोनों सोमवार को हो रहा है इसलिए कुल 5 व्रत आएंगे। सावन 22 जुलाई सोमवार से शुरू होकर 19 अगस्त सोमवार को ही पूर्ण होने जा रहा है। आज इस लेख में हम आपको, महादेव के 5 मुख का रहस्य समझाने जा रहे है। 

एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने भगवान शंकर से पूछा कि हे प्रभु ! सृष्टि आदि 5 कृत्यों के लक्षण क्या है? यह हम दोनों को बतलाइए। भगवान शिव बोले, मेरे कर्तव्यों को समझना अत्यंत गहन है तथापि मैं कृपा पूर्वक तुम्हें उनके विषय में बता रहा हूं। हे ब्रह्मा और विष्णु ! "सृष्टि",  "पालन",  "संहार",  "तिरोभाव"  और "अनुग्रह" यह पांच ही मेरे जगत संबंधी कार्य हैं जो कि नित्य सिद्ध हैं।

संसार की रचना का जो आरंभ है उसी को सर्ग या "सृष्टि" कहते हैं। मुझसे पालित होकर सृष्टि का सुस्थिर रूप से रहना ही उसकी "स्थिति है" , उसका विनाश ही "संहार" है। प्राणों के उत्क्रमण को "तिरोभाव" कहते हैं और जब इन सब से छुटकारा मिल जाता है तो वह मेरा "अनुग्रह" है। इस प्रकार मेरे 5 कृत्य हैं। सृष्टि आदि जो चार कृत्य हैं वह संसार का विस्तार करने वाले हैं। पांचवा कृत्य "अनुग्रह" मोक्ष का हेतु है। वह सदा मुझ में ही अचल भाव से स्थिर रहता है।

मेरे भक्तजन इन पांचों कृत्यों को पांचो भूतों में देखते हैं। "सृष्टि" भूतल में, "स्थिति "जल में,  "संहार" अग्नि में "तिरोभाव" वायु में और "अनुग्रह" आकाश में स्थित है। पृथ्वी से सब की सृष्टि होती है। जल से सब की वृद्धि होती है जीवन रक्षा होती है। आग सब को जला देती है और वायु सब को एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाती है। आकाश सब को अनुग्रहित करता है। विद्वान पुरुषों को यह विषय इसी रूप में जानना चाहिए।

इन 5 कृत्यों का भार वहन करने के लिए ही मेरे पांच मुख हैं। चार दिशाओं में चार मुख हैं और इनके बीच में पांचवा मुख है। हे पुत्रों , तुम दोनों ने तपस्या करके प्रसन्न हुए मुझ परमेश्वर से "सृष्टि" और "स्थिति" नामक दो कृत्य प्राप्त कर लिए हैं। यह दोनों तुम्हें बहुत प्रिय हैं। इस प्रकार मेरा विभूति स्वरूप रूद्र महेश्वर में दो अन्य उत्तम कृत्य "संहार"और "तिरोभाव" तुमने मुझ से प्राप्त किए हैं लेकिन अनुग्रह नामक कृत्य दूसरा कोई नहीं पा सकता।

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