Bhishma Pitamah Story: भीष्म पितामह का जीवन और उनका अंतिम संस्कार केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि जीवन का गहरा दर्शन है। उन्होंने युद्धभूमि में भी धर्म की मर्यादा बनाए रखी और मृत्यु के क्षण में भी धैर्य, श्रद्धा और अध्यात्म का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।
Mahabharat Katha: महाभारत के महान पात्रों में भीष्म पितामह का स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वे केवल हस्तिनापुर के सेनापति या गंगापुत्र ही नहीं थे, बल्कि धर्म, त्याग और प्रतिज्ञा के प्रतीक भी थे। उन्होंने अपने जीवन को एक वचन की मर्यादा में बांध लिया था कि वे आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे और सिंहासन के उत्तराधिकारी नहीं बनेंगे। इसी प्रतिज्ञा ने उन्हें “भीष्म” नाम दिलाया, लेकिन उनके जीवन का सबसे मार्मिक अध्याय युद्धभूमि पर नहीं, बल्कि उनके अंतिम संस्कार के समय खुलता है।
महाभारत युद्ध के दसवें दिन कौरवों की सेना के सेनापति भीष्म पितामह थे। वे अतुलनीय योद्धा थे। कोई भी उन्हें परास्त नहीं कर पा रहा था। तब श्रीकृष्ण के संकेत पर अर्जुन ने शिखंडी को आगे रखकर उनसे युद्ध किया। शिखंडी, जो पहले अम्बा थी और पुनर्जन्म लेकर स्त्री से पुरुष बने थे, उनके सामने भीष्म ने शस्त्र उठाने से मना कर दिया था, क्योंकि वे स्त्रियों के प्रति कभी अस्त्र नहीं उठाते थे।
अर्जुन ने उसी अवसर का लाभ उठाकर बाणों की वर्षा की, और भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर गिर पड़े। उन्होंने अपनी इच्छा से मृत्यु को टालने का वरदान प्राप्त किया था, इसलिए वे “इच्छा मृत्यु” वाले देवतुल्य मनुष्य कहे जाते हैं। उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने तक प्राण त्याग न करने का निश्चय किया।
बाणों की शय्या पर भीष्म का तप
भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे हुए थे। उनके शरीर में सैकड़ों बाण चुभे हुए थे, और रक्त बह रहा था। श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन से कहा कि वे बाणों से एक तकिया बना दें ताकि पितामह का सिर ऊपर उठ सके। अर्जुन ने तुरंत बाणों का तकिया बनाया। भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा में गहन ध्यान और तप किया। उनके चारों ओर युद्ध समाप्त हो चुका था।
युधिष्ठिर राज्याभिषेक की तैयारी में थे, परंतु जब तक पितामह जीवित थे, वे राज्यग्रहण नहीं करना चाहते थे। इसलिए सभी पांडव और श्रीकृष्ण प्रतिदिन उनसे धर्म, नीति और जीवन के गूढ़ उपदेश सुनने आते। यही उपदेश आगे चलकर “भीष्म पर्व” के रूप में महाभारत का एक महान खंड बना।
उत्तरायण का आगमन
जब सूर्य उत्तरायण हुआ अर्थात सूर्य का रथ दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ा, तब भीष्म पितामह ने देह त्याग का निर्णय लिया। यह दिन माघ मास की शुक्ल अष्टमी तिथि का था, जिसे आज भी “भीष्म अष्टमी” के नाम से मनाया जाता है। उन्होंने पांडवों को अपने समीप बुलाया। श्रीकृष्ण, व्यास, धृतराष्ट्र, विदुर, नारद और अनेक ऋषि वहां उपस्थित थे। भीष्म ने अपने अंतिम उपदेश दिए “धर्म, नीति, राजधर्म, दण्डनीति” और जीवन के सार को समझाया। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि सच्चा राजा वह है जो प्रजा के सुख-दुख में समान रूप से सहभागी हो।
फिर उन्होंने श्रीकृष्ण की स्तुति की और कहा कि हे केशव! यदि मुझे तुमसे एक वरदान मिल सके, तो यही कि मेरी आत्मा सदैव धर्म के मार्ग पर अटल रहे। श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर कहा कि “गंगापुत्र, तुम्हारी कीर्ति युगों-युगों तक अमर रहेगी। इसके बाद भीष्म ने सूर्य की ओर दृष्टि की और कहा कि अब समय आ गया है। उन्होंने अपने बाणों की शय्या से धीरे-धीरे देह को मुक्त किया और योग की मुद्रा में प्राण त्याग दिया।
इच्छाओं को किसने किया था पूरा?
भीष्म के देहावसान के बाद सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र शोक में डूब गया। युद्ध की विभीषिका के बाद भी यह दृश्य अत्यंत करुण था। पांडवों, धृतराष्ट्र, गांधारी, कुन्ती और समस्त हस्तिनापुर के नागरिकों ने उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, उनके शरीर को बाणों की शय्या से उतारना भी एक कठिन कार्य था।
श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन से कहा कि वे दिव्य अस्त्रों की सहायता से उनके शरीर को सावधानीपूर्वक मुक्त करें। अर्जुन ने “अग्नेयास्त्र” और “वारुणास्त्र” का उपयोग करके उनके शरीर से बाणों को बिना क्षति पहुंचाए निकाल दिया। फिर गंगा तट पर उनके शरीर को ले जाया गया। गंगा माता स्वयं प्रकट हुईं और विलाप करने लगीं “हे पुत्र, तुमने अपना वचन निभाया, पर मेरा हृदय टूट गया।” श्रीकृष्ण ने उन्हें सांत्वना दी और कहा कि उनका पुत्र यशस्वी हुआ है, क्योंकि उसने धर्म के लिए जीवन बलिदान किया।
चिता को किसने दी थी अग्नि
यह प्रश्न अक्सर उठता है कि भीष्म पितामह की चिता को अग्नि किसने दी? महाभारत के अनुसार, अर्जुन ने ही उनके अंतिम संस्कार की अग्नि दी थी। अर्जुन, जो स्वयं भीष्म के प्रिय शिष्य थे, ने अग्नेयास्त्र के माध्यम से चिता को अग्नि प्रदान की। इसका कारण यह था कि भीष्म ने जीवन में ब्रह्मचर्य व्रत रखा था और विवाह नहीं किया था, इसलिए उनका कोई पुत्र नहीं था। प्राचीन परंपरा के अनुसार, पिता के अभाव में पुत्रवत् शिष्य या प्रिय जन ही अंतिम संस्कार करते हैं। अर्जुन ने यह कर्तव्य पुत्र की भांति निभाया।
कथा में वर्णन है कि अर्जुन ने गंगा तट पर लकड़ियों से चिता सजाई, फिर अग्नेयास्त्र से अग्नि उत्पन्न की और पितामह की देह को अग्नि को समर्पित किया। उस समय आकाश से पुष्पवर्षा हुई, देवताओं ने “धर्म के प्रतिरूप” को नमन किया और गंगा माता ने अपने पुत्र को अपने आंचल में समेट लिया।
भीष्म पितामह की आत्मा का गमन
अग्नि में आहुति देने के बाद, जब चिता जलने लगी, तब सभी ने देखा कि प्रकाश का एक तेजस्वी पुंज आकाश की ओर उठा। वह भीष्म की आत्मा थी, जो सूर्य की ओर गमन कर रही थी। देवताओं ने उनका स्वागत किया। श्रीकृष्ण ने पांडवों से कहा कि ऐसा मनुष्य विरले ही जन्म लेता है। धर्म का जितना पालन भीष्म ने किया, उतना कोई और नहीं कर सकता। युधिष्ठिर और उनके भाई आंसू रोक नहीं पाए। उन्होंने पितामह के चरणों को नमन किया और प्रण किया कि वे उनके बताए धर्ममार्ग पर चलेंगे।
भीष्म अष्टमी का महत्व
भीष्म पितामह की देहत्याग की तिथि “भीष्म अष्टमी” कहलाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार यह माघ मास की शुक्ल अष्टमी को आती है। इस दिन श्रद्धापूर्वक गंगा स्नान, तर्पण और उपवास करने का विधान है। मान्यता है कि जो इस दिन भीष्म का स्मरण करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है। भीष्म पितामह के उपदेश आज भी धर्म, नीति और कर्तव्य की सर्वोच्च शिक्षा माने जाते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि वचन और धर्म के लिए व्यक्ति को अपने सुख और जीवन तक का त्याग करने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए।
क्या मिलता है संदेश?
भीष्म पितामह का जीवन और उनका अंतिम संस्कार केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि जीवन का गहरा दर्शन है। उन्होंने युद्धभूमि में भी धर्म की मर्यादा बनाए रखी और मृत्यु के क्षण में भी धैर्य, श्रद्धा और अध्यात्म का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी चिता को अर्जुन द्वारा दी गई अग्नि केवल शरीर की विदाई नहीं थी, बल्कि धर्म के उस युग की पूर्णता थी, जहां वचन, निष्ठा और सत्य सर्वोच्च थे। भीष्म पितामह की आत्मा आज भी हमें यही संदेश देती है कि धर्म ही जीवन का आधार है, और जो धर्म का पालन करता है, वह मृत्यु के बाद भी अमर रहता है।
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।