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Lord Shiva: भगवान शिव क्यों कहलाए नीलकंठ, जानिए पौराणिक कथा

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Sat, 22 Jun 2024 05:36 PM IST
सार

Lord Shiva: गंगाधर, महादेव, भोलेनाथ, आदियोगी, शंकर, चंद्रशेखर ये सब महादेव के नाम है आपको बता दे कि भगवान शिव जितने नाम हैं, उतने ही रूप भी हैं। भोलेनाथ के हर रूप की पूजा करने से आशीर्वाद मिलता है।

भगवान शिव
भगवान शिव- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Lord Shiva: गंगाधर, महादेव, भोलेनाथ, आदियोगी, शंकर, चंद्रशेखर ये सब महादेव के नाम है आपको बता दे कि भगवान शिव जितने नाम हैं, उतने ही रूप भी हैं। भोलेनाथ के हर रूप की पूजा करने से आशीर्वाद मिलता है। भगवान शिव अपने भक्तों पर बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं। भक्त के मन की मधुर भावनाएं शिव को प्रसन्न कर देती हैं और महादेव प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनचाहा वरदान देते हैं। आज के लेख में हम आपको बताएंगे कि भगवान शिव का नाम नीलकंठ कैसे पड़ा
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भगवान शिव का नाम नीलकंठ कैसे पड़ा Bhagavan Shiv Ka Nam Neelakanth Kaise Pada

शास्त्रों के अनुसार एक बार देवताओं और दानवों के बीच अमृत मंथन हुआ। यह मंथन क्षीरसागर यानी दूध के सागर में हुआ था। इस मंथन से 14 रत्न निकले- लक्ष्मी, शंख, कौस्तुभमणि, ऐरावत, पारिजात, उच्चैःश्रवा, कामधेनु, कालकूट, रंभा नामक अप्सरा, वारुणी मदिरा, चंद्रमा, धन्वंतरि, अमृत और कल्पवृक्ष। इनमें से देवता अमृत को अपने साथ ले जाने में सफल हुए। लेकिन मंथन से निकले 14 रत्नों में से विष भी निकला। माना जाता है कि यह विष इतना खतरनाक था कि इसकी एक बूंद पूरी दुनिया को नष्ट कर सकती थी। इससे परेशान सभी देवता और दानव इसका समाधान जानने के लिए विष का घड़ा लेकर भगवान शिव के पास गए। भगवान शिव को इसका समाधान सोचा और उन्होंने विष का पूरा घड़ा खुद ही पी लिया। लेकिन भगवान शिव ने इस विष को निगला नहीं कहा जाता है कि भगवान शिव ने इस विष को अपने कंठ में ही रोक लिया। इससे उनका कंठ नीला पड़ गया, जिसके बाद उनका नाम नीलकंठ पड़ा।

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नीलकंठ मंदिर की स्थापना कैसे हुई  Neelakanth Mandir Kee Sthaapana Kaise Huyi

विष की गर्मी से बेचैन भगवान शिव शीतलता की खोज में हिमालय की ओर चले गए और वे मणिकूट पर्वत पर पंकजा और मधुमती नदियों के संगम पर एक वृक्ष के नीचे नदियों की शीतलता को निहारते हुए बैठ गए। जहां वे पूर्ण रूप से समाधि में लीन हो गए और वर्षों तक समाधि में ही रहे, जिससे माता पार्वती को कष्ट हुआ। माता पार्वती भी पर्वत पर बैठकर भगवान शिव के समाधि में जाने का इंतजार करने लगी। लेकिन कई वर्षों के बाद भी भगवान शिव समाधि में लीन रहे। देवी-देवताओं की प्रार्थना के बाद भोलेनाथ ने अपनी आंखें खोलीं और कैलाश जाने से पहले उन्होंने इस स्थान का नाम नीलकंठ महादेव रखा। इसी वजह से आज भी इस स्थान को नीलकंठ महादेव के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर भगवान शिव समाधि में लीन हुए थे, उस वृक्ष के नीचे वाले स्थान पर एक विशाल मंदिर है और हर साल लाखों शिव भक्त इस मंदिर में दर्शन करने आते हैं।

 

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