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Kashi Ke Kotwal: काल भैरव को क्यों कहा जाता है काशी का कोतवाल ?जानिए

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Mon, 01 Jul 2024 02:28 PM IST
सार

Kashi Ke Kotwal: काशी विश्वनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों मे से एक है, काशी में बसे भगवान शिव के बारे में अधिकतर लोग जानते हैं। भगवान शिव को यहां का राजा कहा जाता है और बाबा काल भैरव को यहां का रक्षक,

काशी का कोतवाल
काशी का कोतवाल- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Kashi Ke Kotwal: काशी विश्वनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों मे से एक है, काशी में बसे भगवान शिव के बारे में अधिकतर लोग जानते हैं। भगवान शिव को यहां का राजा कहा जाता है और बाबा काल भैरव को यहां का रक्षक, आज के इस लेख में हम आपको बताएंगे की कालभैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहा जाता है  और यहां भगवान शिव से पहले काल भैरव की पूजा क्यों होती है 
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कैसे हुआ काल भैरव का जन्म 

चलिए आपको काल  भैरव की उत्पत्ति के बारे में बताते हैं आपको बता दें कि  एक बार भगवान शिव, विष्ण और ब्रम्हदेव के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया कि सबसे श्रेष्ठ कौन है । काफी  कोशिश करने के बाद भी इस समस्या का कोई हल नहीं निकला। इसके बाद सभी देवियों और देवताओं से पूछा गया कि हम तीनों में सबसे श्रेष्ठ कौन है। बहुत विचार- करने के बाद सभी देवता और ऋषिगण ने भगवान शिव को श्रेष्ठ बताया भगवान विष्णु ने तो इस बात को स्वीकार कर लिया लेकिन  ब्रम्हदेव इस बात से क्रोधित हो गए भगवान शिव को अपशब्द कहने लगे। इससे भगवान शिव क्रोधित हो गए और इसी क्रोध से काल भैरव का जन्म हुआ।

भगवान शिव का यह रूप देखकर सभी देवता भयभीत हो गए। काल भैरव ने ब्रह्मा का एक सिर काट दिया। सभी देवता काल भैरव से शांत होने की विनती करने लगे। इसके बाद ब्रह्मा जी ने काल भैरव से क्षमा मांगी। जिसके बाद वे शांत हुए। हालांकि काल भैरव पर ब्रह्मा हत्या का पाप लगा था। जिसके कारण उन्हें दंड भोगना पड़ा। उन्हें कई वर्षों तक भिखारी के वेश में धरती पर भटकना पड़ा। काशी पहुंचने पर उनकी सजा समाप्त हो गई। इसीलिए काल भैरव को दंडपाणि कहा जाता है।
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क्यों कहा जाता है काल भैरव को काशी का कोतवाल 

बाबा काल भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है। मान्यता है कि काशी नगरी में काल भैरव की मर्जी चलती है। बाबा विश्वनाथ के मंदिर के पास एक पुलिस चौकी भी है, जिसकी रक्षा स्वयं काल भैरव करते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए काल भैरव ने अपने नाखून से एक तालाब की स्थापना की और उस तालाब में  स्नान किया। जिसके बाद उन्हें ब्रह्महत्या से मुक्ति मिली। ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिलने के बाद भगवान शिव प्रकट हुए और काल भैरव को वहीं रहकर तपस्या करने का आदेश दिया। इसके बाद काल भैरव काशी में ही बस गए। भगवान शिव ने काल भैरव को इस नगरी का कोतवाल बनने के लिए भी कहा।

बाबा विश्वनाथ से पहले क्यों की जाती है काल भैरव की पूजा 

कहते हैं कि काल भैरव मंदिर में चढ़ाई गई प्रार्थना के बाद ही बाबा विश्वनाथ प्रार्थना सुनते हैं। ऐसा कहा जाता है कि काशी में जिसने पहले काल भैरव के दर्शन नहीं किए, उसकी प्रार्थना अधूरी मानी जाती है और भक्त को उसका फल नहीं मिलता।

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