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Bhagavad Gita Part 131: किस पुरुष को अपने ही समान मानते है श्री कृष्ण? जानें इस सवाल का जवाब

jeevanjali Published by: निधि Updated Sun, 17 Mar 2024 06:19 PM IST
सार

Bhagavad Gita: भगवद्गीता के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, कृष्ण अर्जुन को समझाते है कि 4 प्रकार के प्राणी उनको भजते है।

भगवद्गीता
भगवद्गीता- फोटो : JEEVANJALI

विस्तार

Bhagavad Gita: भगवद्गीता के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, कृष्ण अर्जुन को समझाते है कि 4 प्रकार के प्राणी उनको भजते है।

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते, प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ( अध्याय 7 श्लोक 17 )

तेषाम्-उनमें से; ज्ञानी–वे जो ज्ञान में स्थित रहते हैं; नित्य-युक्त:-सदैव दृढ़; एक-अनन्य; भक्ति:-भक्ति में; विशिष्यते-श्रेष्ठ है; प्रियः-अति प्रिय; हि-निश्चय ही; ज्ञानिनः-ज्ञानवान; अत्यर्थम्-अत्यधिक; अहम्-मैं हूँ; सः-वह; च-भी; मम–मेरा; प्रियः-प्रिय।

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अर्थ - इनमें से मैं उन्हें श्रेष्ठ मानता हूँ जो ज्ञान युक्त होकर मेरी आराधना करते हैं और दृढ़तापूर्वक अनन्य भाव से मेरे प्रति समर्पित होते हैं। मैं उन्हें बहुत प्रिय हूँ और वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं।

व्याख्या - पिछले श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन को कहते है कि चार प्रकार के प्राणी उनका भजन करते है। इस श्लोक में वो ये बताते है कि उन चार में से उनका प्रिय कौन है। वो कहते है कि जो शुद्ध बुद्धि से युक्त है और ज्ञानी है वो मुझे प्रिय है। ऐसा वो इसलिए कहते है क्योंकि शुद्ध बुद्धि वाला व्यक्ति दृढ भाव से भक्ति में लीन रहता है। उसकी शृद्धा अटल होती है। वो सांसारिक और इन्द्रिय सुख के छलावे में नहीं आता और अपने कर्म को कर्तव्य समझकर करता है।

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उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् , आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ( अध्याय 7 श्लोक 18 )

उदारा:-महान; सर्वे सभी; एव–वास्तव में; एते-ये; ज्ञानी–वे जो ज्ञान में स्थित रहते हैं; तु–लेकिनः आत्मा-एव-मेरे समान ही; मे मेरे; मतम्-विचार; आस्थित:-स्थित; सः-वह; हि-निश्चय ही; युक्त-आत्मा भगवान में एकीकृत; माम्-मुझे एव–निश्चय ही; अनुत्तमाम्-सर्वोच्च गतिम्-लक्ष्य।

अर्थ - वास्तव में वे सब जो मुझ पर समर्पित हैं, निःसंदेह महान हैं। लेकिन जो ज्ञानी हैं और स्थिर मन वाले हैं और जिन्होंने अपनी बुद्धि मुझमें विलय कर दी है और जो केवल मुझे ही परम लक्ष्य के रूप में देखते हैं, उन्हें मैं अपने समान ही मानता हूँ।

व्याख्या - इस संसार में ऐसे कई लोग है जो शुद्ध आचरण करते हुए श्री भगवान् का भजन करते है। हालांकि वो संसार के सुख में भले ही लीन रहते है लेकिन उनका समर्पण ईश्वर पर ही रहता है। श्री कृष्ण कहते है ऐसे लोग महान है। इस माया रूपी संसार में इतना कर पाना भी हर किसी के बस की बात नहीं होती है। आगे कृष्ण कहते है की कुछ ऐसे महान लोग भी है जिन्हे मैं अपने समान ही मानता हूं। ऐसे लोग जिनका मन स्थिर है, एकाग्र है वो कृष्ण को प्रिय है। ऐसे लोग जिनकी बुद्धि ईश्वर में विलय हो गई है और जो ईश्वर को ही परम लक्ष्य के रूप में देखते है वो मेरे ही समान है।

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