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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 9 - 10: संसार की रचना के बाद भी भौतिक कर्मों से सदैव विरक्त कैसे रहते है कृष्ण?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Fri, 21 Jun 2024 03:04 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 9 - 10: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की, यह सम्पूर्ण विराट जगत कृष्ण के आधीन है। यह उनकी इच्छा से ही प्रकट होता है और उनकी इच्छा से ही नष्ट हो जाता है। 

Bhagwat Geeta Chapter 9, Verse 9, 10:
Bhagwat Geeta Chapter 9, Verse 9, 10:- फोटो : JEEVANJALI

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 9 - 10: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की, यह सम्पूर्ण विराट जगत कृष्ण के आधीन है। यह उनकी इच्छा से ही प्रकट होता है और उनकी इच्छा से ही नष्ट हो जाता है। 
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 9 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 9 

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु 

न – कभी नहीं; च – भी; माम् – मुझको; कर्माणि – कर्म; निबध्नन्ति – बाँधते हैं; धनञ्जय – हे धन के विजेता; उदासीन-वत् – निरपेक्ष या तटस्थ की तरह; आसीनम् – स्थित हुआ; असक्तम् – आसक्तिरहित; तेषु – उन; कर्मसु – कार्यों में। 


अर्थ - ये सारे कर्म मुझे नहीं बाँध पाते हैं।  मैं उदासीन की भाँति इन सारे भौतिक कर्मों से सदैव विरक्त रहता हूँ। 

व्याख्या - यह श्लोक पिछले श्लोक का ही विस्तार है। कृष्ण जब यह कहते है कि एक कल्प के बाद संसार और ब्रह्माण्ड मुझमे ही विलीन हो जाता है तो वह यह भी स्पष्ट करते है कि ये कर्म मुझे प्रभावित नहीं करते है। भौतिक कार्यों से उनका कोई सरोकार नहीं रहता। इसका कारण यह है कि ये कार्य उनके द्वारा नहीं बल्कि उनकी शक्ति के द्वारा पूर्ण किए जा रहे है। संसार का निर्माण करना हो या महा प्रलय हो इन दोनों की घटनाओं के प्रति कृष्ण की विरक्ति है। 
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 10 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 10

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते

मया – मेरे द्वारा; अध्यक्षेण – अध्यक्षता के कारण; प्रकृतिः – प्रकृति; सूयते – प्रकट होती है; स – सहित; चर-अचरम् – जड़ तथा जंगम; हेतुना – कारण से; अनेन – इस; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; जगत् – दृश्य जगत; विपरिवर्तते – क्रियाशील है। 


अर्थ - यह प्राकृत शक्ति मेरी आज्ञा से चर और अचर प्राणियों को उत्पन्न करती है। इसी कारण यह जगत् बारम्बार सृजित और विनष्ट होता रहता है। 

व्याख्या - जैसा की पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि, भगवान विभिन्न जीवन रूपों के सृजन के कार्य में प्रत्यक्ष रूप से कोई भूमिका अदा नहीं करते है लेकिन यह सब होता उनकी इच्छा से ही है। भगवान् इस जगत् से प्रत्यक्ष रूप में आसक्त नहीं होते। वो अपनी प्रकृति की शक्ति के माध्यम से इस संसार की रचना करते है। और पंचभूत ही सभी चर और अचर प्राणियों की उत्पत्ति का कारण बनते है और इसी कारण यह संसार बार बार बनता और बिगड़ता रहता है।
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