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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 7-8: क्या महाप्रलय होने के बाद भी बना रहता है कृष्ण का दिव्य स्वरुप? जानें

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Thu, 20 Jun 2024 04:53 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 7-8: भगवद गीता के इस लेख में हम आपको बताएंगे कि आगे क्या हुआ, जितनी भी जीवात्मा है उन सबका सम्बन्ध श्री कृष्ण से है।

Bhagavad Gita, Chapter 9, Verse 7-8:
Bhagavad Gita, Chapter 9, Verse 7-8:- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 7-8: भगवद गीता के इस लेख में हम आपको बताएंगे कि आगे क्या हुआ, जितनी भी जीवात्मा है उन सबका सम्बन्ध श्री कृष्ण से है। वो सब अपना अपना कर्म करते हुए अंत में श्री भगवान् को ही प्राप्त होती है। इसलिए सब कुछ भगवान में ही स्थित है। आगे कृष्ण बोले, 
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 7 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 7

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृति यान्ति मामिकाम्। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्

यान्ति–विलीन होना; मामिकाम्-मेरी; कल्प-क्षये-कल्प के अन्त में; पुनः फिर से; तानि-उनमें; कल्प-आदो-कल्प के प्रारम्भ में; विसृजामि–व्यक्त करता हूँ; अहम्-मैं। प्रकृतिम्-भौतिक शक्ति; स्वाम्-मेरी निजी; अवष्टभ्य–प्रवेश करके; विसृजामि उत्पन्न करता हूँ। 


अर्थ - एक कल्प के अन्त में सभी प्राणी मेरी आदि प्राकृत शक्ति में विलीन हो जाते हैं और अगली सृष्टि के प्रारंभ में, मैं उन्हें पुनः प्रकट कर देता हूँ। 
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व्याख्या - इस अध्याय के शुरू में श्री कृष्ण ब्रह्मा जी की आयु के बारे में समझा चुके है। ब्रह्माजी के एक दिन का नाम ‘कल्प’ है, यह एक हजार चतुर्युगी का होता है और उतनी ही ब्रह्मा जी की रात है। ब्रह्माजी की आयु सौ वर्षों की होती है।  पृथ्वी के 311 खरब 40 अरब वर्ष के बराबर है। अब कृष्ण यह कह रहे है कि इस आयु के पूर्ण होने के बाद पूरा अंतरिक्ष ही विघटित हो जाता है। यानी कि उनकी प्राकृत शक्ति में विलीन हो जाता है। इसके बाद जब वापिस संसार की रचना की जाती है तो उन्हें दोबारा श्री विष्णु के द्वारा उत्पन्न किया जाता है। 

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 8 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 8

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्

पुनः-पुन:-बारम्बार; भूत-ग्रमम्-असंख्य जीवन रूपों को; इमम्-इन; कृत्स्नम्-सबकोः; अवशम्-नियंत्रण से परे; प्रकृतेः-प्रकृति के; वशात्-बल में। 


अर्थ - यह सम्पूर्ण विराट जगत मेरे आधीन है। यह मेरी इच्छा से ही प्रकट होता है और मेरी इच्छा से ही नष्ट हो जाता है। 

व्याख्या - इस श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे है कि जब प्रलय हो जाती है उसके बाद वो अपने महाविष्णु के अवतार की मदद से वापिस इस प्रकृति की रचना करते है। ईश्वर की शक्ति सदैव उनके साथ रहती है लेकिन वो उससे भिन्न रहते है। उनका एक अंश सभी जीवों के अंदर विराजमान रहता है लेकिन वो जीव से अलग बने हुए रहते है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस पृथ्वी जैसे अनेकों ग्रहों पर श्री कृष्ण का अधिकार है और उनका दिव्य स्वरुप सदैव नवीन रहता है। वो कभी नष्ट नहीं हो सकते।
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