विज्ञापन
Home  mythology  bhagwat katha  bhagwat geeta chapter 9 verse 34 if you follow these rules you will definitely get the support of krishna

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 34: इन नियमों का पालन करेंगे तो अवश्य मिलेगा श्री कृष्ण का साथ?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Thu, 11 Jul 2024 01:53 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 34: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- इस संसार से भी एक अलग संसार है जहां जाने के बाद जीवात्मा जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 34
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 34- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 34: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- इस संसार से भी एक अलग संसार है जहां जाने के बाद जीवात्मा जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है और जब स्वयं भगवान् खुद इस बात को स्पष्ट रूप से कह रहे है। आगे कृष्ण ने कहा,
विज्ञापन
विज्ञापन

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 34 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 34

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः 

मत्-मना:-सदैव मेरा चिन्तन करने वाला; भव-होओ; मत्-मेरा; भक्त:-भक्त; मत्-मेरा; याजी-उपासक; माम्-मुझको; नमस्कुरू-नमस्कार करो; माम्-मुझको; एव–निःसंदेह; एष्यासि-पाओगे; युक्त्वा तल्लीन होकर; एवम्-इस प्रकार; आत्मानम्-आत्मा को; मत्-परायणः-मेरी भक्ति में अनुरक्त।

विज्ञापन


अर्थ - सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो। अपने मन और शरीर को मुझे समर्पित करने से तुम निश्चित रूप से मुझको प्राप्त करोगे।  

व्याख्या - नवम अध्याय के आखिरी श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन को भक्ति मार्ग को अपनानें के लिए कहते है। कृष्ण अर्जुन को समझा रहे है कि ये जो भौतिक कल्मष है इन सबसे मुक्ति का एक मात्र साधन कृष्ण की भक्ति है। संसार के सुख का चिंतन करने की बजाय क्यों न कृष्ण का चिंतन किया जाए ? किसी ढोंगी पांखडी की पूजा करने की बजाय क्यों ना कृष्ण की पूजा की जाए ?

संसार के सुख वैभव में कितना ही मनुष्य मन लगा ले और कितना ही उनको प्राप्त कर ले वह कभी संतुष्ट नहीं हो सकता। इस मन को इन्द्रियों में लगाने की बजाय क्यों न भगवान् के चरणों में लगा दिया जाए ? इस शरीर से हम सुख को प्राप्त करने के लिए ना जाने कितने पाप कर्म करते है ! क्रोध, लोभ, ईर्ष्या जैसे दुर्गुण हमारी बुद्धि में आकर शरीर को दूषित करते है। 

इसके बाद भी क्या प्राप्त होता है ? एक समय के बाद बूढ़े बनकर मर जाना है। जीवन भर हम जिन लोगों को अपने शरीर से माध्यम से सुख प्रदान करते है वहीं एक दिन आपको असहाय छोड़ देते है ! तो ऐसे मोह का क्या करना जो आपकी मुक्ति नहीं कर सकता? इसके बजाय तो आप इस शरीर को कृष्ण भक्ति में लगा दीजिए जिससे आपको भौतिक कल्मष से मुक्ति तो प्राप्त होगी। 

जीवात्मा एक जन्म से दूसरे जन्म में कर्म के माध्यम से जन्म लेती रहती है और इस संसार सागर में दुःखी होती है। कृष्ण तो पहले ही इस बात को समझा चुके है कि संसार में कुछ भी अमर नहीं है। इस ब्रह्माण्ड की हर वस्तु एक समय के बाद नष्ट होनी है ! ऐसे में आखिर क्यों यहां बार बार जन्म लेना है ? मनुष्य को चाहिए कि वो कृष्ण भक्ति करें और स्वयं को इस जीवन और मरण के चक्र से मुक्ति प्रदान करें।
विज्ञापन