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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 33 : इस संसार में दुःख, कष्ट और पीड़ा से छुटकारा पाने का उपाय क्या है?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Wed, 10 Jul 2024 06:17 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 33 : भगवद्गीता के इस  लेख में हम आपको बताते है आगे क्या हुआ- कृष्ण ने इस बात को भली भांति समझाया है कि किसी भी जाति, कुल में पैदा हुआ।

Bhagwat Geeta
Bhagwat Geeta- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 33 : भगवद्गीता के इस  लेख में हम आपको बताते है आगे क्या हुआ- कृष्ण ने इस बात को भली भांति समझाया है कि किसी भी जाति, कुल में पैदा हुआ व्यक्ति अपनी भक्ति के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। इसमें किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं है। आगे कृष्ण कहते है -
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किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ( अध्याय 9 श्लोक 33 )

किम्-क्या, कितनाः पुनः-फिर; ब्राह्यणाः-ज्ञानी; पुण्या:-धर्मात्मा; भक्ताः-भक्तगण; राजऋषयः-राजर्षि; तथा-भी; अनित्यम्-अस्थायी; असुखम्-दुखमय; लोकम्-संसार को; इमम्-इस; प्राप्य–प्राप्त करके; भजस्व-अनन्य भक्ति में लीन; माम्-मेरी।  

अर्थ - फिर धर्मात्मा ब्राह्मणों, भक्तों तथा राजर्षियों के लिए तो कहना ही क्या है !अतः इस क्षणिक दुखमय संसार में आ जाने पर मेरी प्रेमाभक्ति में अपने आपको लगाओ। 
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व्याख्या - इस श्लोक में श्री कृष्ण भक्ति क्यों करनी चाहिए इस प्रश्न का उत्तर दे रहे है। कृष्ण कहते है कि ये संसार नित्य नहीं है और आनंद से रहित है। एक समय के बाद यह नष्ट हो जाता है। जीवात्मा सुख दुःख, लाभ हानि, जीवन मरण में जीवन बीता देती है। ऐसे में आखिर भक्ति से दूर क्यों जाना है ? पिछले श्लोक में कृष्ण कहते है कि वो तो पतित मनुष्यो तक का कल्याण करते है। ऐसे में धर्मात्मा ब्राह्मणों, भक्तों तथा राजर्षियों के लिए तो भक्ति का मार्ग कठिन नहीं होना चाहिए। 

कोई भी जीवात्मा अपने पुण्य कर्मों से अगले जन्म में उच्च कुल में जन्म लेती है। संसार में ब्राह्मण, राजाओं, ऋषियों की स्थिति उत्तम मानी गई है। यहां अर्जुन राजा के कुल में पैदा हुआ है। उसके अंदर बचपन से ऐसे संस्कार है इसलिए कृष्ण उसे भक्ति के लिए प्रेरणा दे रहे है। यह संसार सदैव दुःख ही देने वाला है इसलिए जीवात्मा को भक्ति का मार्ग लेना चाहिए। 

इस संसार से भी एक अलग संसार है जहां जाने के बाद जीवात्मा जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाती है और जब स्वयं भगवान् खुद इस बात को स्पष्ट रूप से कह रहे है तो उसके बाद तो जीवात्मा को तुरंत भक्ति के मार्ग का ही प्रयास करना चाहिए। इसलिए कृष्ण कहते है, मेरी भक्ति में ही स्वयं को लगाओ। ऐसा करने से यह संसार तुम्हे अधिक पीड़ा नहीं दे पायेगा।
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