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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 32: क्या समाज से तिरस्कृत व्यक्ति भी ईश्वर को प्राप्त कर सकते है ?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Wed, 10 Jul 2024 01:51 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 32: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- भगवान् का भक्त ना सिर्फ इस लोक में अपने उत्तम कर्मो के द्वारा प्रसिद्द होगा बल्कि परलोक में भी चिर स्थायी शांति को प्राप्त होगा।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 32
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 32- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 32: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- भगवान् का भक्त ना सिर्फ इस लोक में अपने उत्तम कर्मो के द्वारा प्रसिद्द होगा बल्कि परलोक में भी चिर स्थायी शांति को प्राप्त होगा। यानी कि वो किसी और लोक में निवास करने की बजाय सदा के लिए कृष्ण के लोक में चला जायेगा। आगे कृष्ण ने कहा, 
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 32 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 32

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् 

माम्-मेरी; हि-निःसंदेह; पार्थ-पृथापुत्र, अर्जुनः व्यपाश्रित्य-शरण ग्रहण करके; ये-जो; अपि-भी; स्युः-हों; पाप-योनयः-निम्नयोनि में उत्पन्न; वैश्या:-व्यावसायिक लोग; तथा भी; शूद्राः-शारीरिक श्रम करने वाले; ते-अपि-वे भी; यान्ति–जाते हैं; परम्-परम; गतिम्-गंतव्य।


अर्थ - वे सब जो मेरी शरण ग्रहण करते हैं भले ही वे जिस कुल, लिंग, जाति के हों और जो समाज से तिरस्कृत ही क्यों न हों, वे परम लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। 
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व्याख्या - भगवतगीता के पिछले अध्यायों में श्री कृष्ण ने कहा था कि एक व्यक्ति की भक्ति में अगर कुछ कमी रह भी जाती है तो भी अगले जन्म में वो उच्च कुल में जन्म लेता है और अपने आप ही भक्ति के मार्ग को स्वीकार कर लेता है। लेकिन ऐसे लोग जो उच्च कुल में पैदा नहीं होते उनका क्या ? ऐसे लोग जिनके परिवार के सदस्य भक्त नहीं है उनका क्या ? यहां श्री कृष्ण इस बात की घोषणा करते है कि ईश्वर किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं करता है। 

श्रीकृष्ण कहते हैं कि किसी भी जाति, लिंग, कुल में जन्म लेने के पश्चात भी जो उनकी पूर्ण शरणागति प्राप्त करता है वह अपने लक्ष्य को पा लेगा। अधम योनी चाण्डाल भी शुद्ध भक्त के संसर्ग से शुद्ध हो जाते हैं। दरअसल भक्ति का मार्ग इतना प्रबल और शुद्ध है कि यहां किसी भी प्रकार का कोई भेद रहता ही नहीं है। कृष्ण इस बात को समझा चुके है कि जीव की वृत्ति के अनुसार ही उसे अगला जन्म प्राप्त होता है लेकिन भक्ति का मार्ग सदैव खुला रहता है। 

कोई भी जीवात्मा किसी भी जन्म में ही सही अगर भक्ति के मार्ग का अनुसरण करने का प्रयास करती है तो वो परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकती है। यहां परम लक्ष्य को प्राप्त करने का अर्थ क्या है ? श्री कृष्ण के धाम को प्राप्त करना। वही एक ऐसा लोक है जहां जाने के बाद जीवात्मा संसार की माया से मुक्त हो सकती है। एक बार जीवात्मा कृष्ण को प्राप्त कर ले उसके बाद जन्म मरण से मुक्ति मिल जाती है। 

इसलिए मनुष्य को यह चाहिए की चाहे वह किसी भी कुल या जाति में जन्म ले उसे भक्ति के मार्ग पर चलने का प्रयास करना ही चाहिए। किसी भी प्रकार के ढोंगी या पाखंडी लोगों की बात में आकर स्वयं को छोटा या पतित नहीं समझना चाहिए। ईश्वर की प्रकृति सबके लिए एक है।
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