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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 31: भगवान के भक्त का कभी विनाश क्यों नहीं होता? जानें इस सवाल का जवाब !

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Tue, 09 Jul 2024 04:07 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 31: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ,  कृष्ण जीवात्मा को उम्मीद देते है कि भले ही  कुछ समय के लिए तुम पतित हो जाओगे।

Bhagwat Geeta
Bhagwat Geeta- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 31: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ, कृष्ण जीवात्मा को उम्मीद देते है कि भले ही  कुछ समय के लिए तुम पतित हो जाओगे लेकिन मेरी भक्ति में विश्वास के कारण मैं तुम्हे वापिस शुद्ध कर दूंगा और मेरी भक्ति में लीन कर दूंगा। आगे कृष्ण ने कहा, 
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 31 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 31

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति

क्षिप्रम्-शीघ्रः भवति–बन जाता है; धर्म-आत्मा-धर्म पर चलने वाला; शश्वत्-शान्तिम्-चिरस्थायी शान्ति; निगच्छति–प्राप्त करना; कौन्तेय-कुन्तीपुत्र, अर्जुन प्रतिजानीहि-निश्चयपूर्वक घोषित कर दो; न कभी नहीं; मे-मेरा; भक्त:-भक्त; प्रणश्यति–विनाश।

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अर्थ - वह तुरन्त धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त होता है। कुन्तीपुत्र ! निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है। 

व्याख्या - एक भक्त के ह्रदय में हमेशा ईश्वर का नाम गुणगान चलता रहता है। इसलिए पिछले श्लोक में कृष्ण कहते है कि अगर कुछ समय के लिए मेरा भक्त अगर माया से प्रभावित भी हो गया तो भी मैं उसकी बुद्धि शुद्ध कर देता हूँ। वहीं कृष्ण यह भी कहते है कि शुद्ध बुद्धि वाला व्यक्ति ही भक्त की पदवी को प्राप्त कर सकता है अशुद्ध बुद्धि वाला नास्तिक बन जाता है। 

अब इसी बात को कृष्ण आगे बढ़ा रहे है। वो अर्जुन को समझा रहे है कि जो मेरी भक्ति कर रहा है या जो मेरी शरण में है वो धर्म का अनुकूल आचरण करने वाला मनुष्य होगा। यह सभी गुण व्यक्ति के हृदय में तभी प्रकट होते है जब वो कर्म बंधन से मुक्त होकर अपने चित्त को मधुसूदन के चरणों में अर्पित करता है। यहां 'शश्वत्-शान्तिम्' का अर्थ लोक और परलोक दोनों में रूप में लगाया जा सकता है। 

भगवान् का भक्त ना सिर्फ इस लोक में अपने उत्तम कर्मो के द्वारा प्रसिद्द होगा बल्कि परलोक में भी चिर स्थायी शांति को प्राप्त होगा। यानी कि वो किसी और लोक में निवास करने की बजाय सदा के लिए कृष्ण के लोक में चला जायेगा। इसलिए कृष्ण कहते है कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं हो सकता है। वो एक समय के बाद कृष्ण के द्वारा जन्म मरण के बंधन से मुक्त कर दिया जायेगा। लेकिन इसके लिए आपके मन का शुद्ध होना आवश्यक है।
 
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