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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 30: क्या एक पापी मनुष्य के हृदय में भक्ति आ सकती है? श्री कृष्ण ने दिया जवाब

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Mon, 08 Jul 2024 01:55 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 30: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताएगे की आगे क्या हुआ- कृष्ण कहते है कि मेरी व्यवस्था ही कुछ इस प्रकार की है कि मैं किसी भी जीव के साथ पक्षपात नहीं करता।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 30
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 30- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 30: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताएगे की आगे क्या हुआ- कृष्ण कहते है कि मेरी व्यवस्था ही कुछ इस प्रकार की है कि मैं किसी भी जीव के साथ पक्षपात नहीं करता। ना मैं किसी से द्वेष करता हूं और ना ही किसी के प्रति मेरा क्रोध है। आगे कृष्ण ने कहा -
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 30 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 30

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः 

अपि-भी; चेत् यदि; सु-दुराचारः-अत्यन्त घृणित कर्म करने वाला पापी; भजते-सेवा करना माम्-मेरी; अनन्य-भाक्-अनन्य भक्ति पूर्वक; साधु:-साधु पुरुष; एव–निश्चय ही; स:-वह; मन्तव्यः-संकल्पः सम्यक्-पूर्णतया; व्यवसित-संकल्प युक्त; हि-निश्चय ही; सः-वह।


अर्थ -  यदि महापापी भी मेरी अनन्य भक्ति के साथ मेरी उपासना में लीन रहते हैं तब उन्हें साधु मानना चाहिए क्योंकि वे अपने संकल्प में दृढ़ रहते हैं। 
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व्याख्या - इस संसार में रहने वाली जीवात्मा माया के प्रभाव से मोहित रहती है। वैसे तो भक्ति के कर्म में लगा हुआ मनुष्य किसी भी प्रकार का कोई पाप नहीं करता लेकिन सांसारिक कर्मों में लगा हुआ मनुष्य कभी गलती कर ही देता है लेकिन भगवान् का यह भी वचन है कि वो अपने भक्त को कभी भी पतित नहीं होने देते है। वो एक समय के बाद उसके हृदय को शुद्ध भी करते है क्यूंकि उनकी भक्ति दृढ है। 

भगवान् श्री कृष्ण यह समझा रहे है कि आकस्मिक पतन का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति भक्ति से बिलग हो गया है। हालांकि हमें यह भी समझना होगा कि इसका अर्थ यह भी नहीं है कि आप पाप करते जाए और कृष्ण नाम भजते जाए। यहां कृष्ण ने सिर्फ माया के प्रभाव से उत्पन्न हुई त्रुटि का उल्लेख किया है। श्री कृष्ण पिछले अध्यायों में इस बात को स्पष्ट कर चुके है कि भक्ति का मार्ग बेहद कठिन है। 

अपने मन, बुद्धि को शुद्ध करके कृष्ण के चरणों में स्वयं को सौंप देना कोई आसान काम नहीं है। माया बेहद प्रबल है। यह देवताओं तक की बुद्धि को हर लेती है , मनुष्य की तो बात ही क्या ? इसलिए कृष्ण जीवात्मा को उम्मीद देते है कि भले ही  कुछ समय के लिए तुम पतित हो जाओगे लेकिन मेरी भक्ति में विश्वास के कारण मैं तुम्हे वापिस शुद्ध कर दूंगा और मेरी भक्ति में लीन कर दूंगा। 

हमारे पुराणों में ऐसे कई उदाहरण है जहां ईश्वर ने पाप कर्म करने वालों को भी मुक्त कर दिया। वाल्मीकि तो लुटेरे थे लेकिन उनके मन में जब भक्ति का प्रवेश हुआ तो उन्होंने रामायण लिखी। इसलिए संसार की कुछ घटनाओं से प्रभावित होकर भक्ति का मार्ग नहीं त्यागना चाहिए। भक्त से ईश्वर प्रेम करते है और आज नहीं तो कल उसे ईश्वर के किसी गण या दूत का साथ मिल ही जाता है।
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