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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 29 : जो नास्तिक है क्या ईश्वर उससे घृणा करते है ? जानिए इस सवाल का जवाब

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Mon, 08 Jul 2024 01:53 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 29 : भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- कृष्ण कहते है कि तुम जो भी कर्म करते हो उसके फल चाहे बुरे हो या अच्छे हो सब मुझे ही अर्पित कर दो।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 29
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 29- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 29 : भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- कृष्ण कहते है कि तुम जो भी कर्म करते हो उसके फल चाहे बुरे हो या अच्छे हो सब मुझे ही अर्पित कर दो। इससे ना तो तुम्हे हर्ष का अनुभव होगा और ना ही तुम शोक को प्राप्त हो ओगे। 
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 29 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 29

राज विद्या योग समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् 

समः-समभाव से व्यवस्थित करना; अहम्-मैं; सर्व-भूतेषु-सभी जीवों को; न कोई नहीं; मे–मुझको; द्वेष्यः-द्वेष; अस्ति–हे; न-न तो; प्रियः-प्रिय; ये-जो; भजन्ति–प्रेमामयी भक्ति; तु-लेकिन; माम्-मुझको; भक्त्या-भक्ति से; मयि–मुझमें; ते-ऐसा व्यक्ति; तेषु-उनमें; च-भी; अपि-निश्चय ही; अहम्-मैं।


अर्थ - मैं समभाव से सभी जीवों के साथ व्यवहार करता हूँ न तो मैं किसी के साथ द्वेष करता हूँ और न ही पक्षपात करता हूँ लेकिन जो भक्त मेरी प्रेममयी भक्ति करते हैं, मैं उनके हृदय में और वे मेरे हृदय में निवास करते हैं। 
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व्याख्या - एक साधारण मनुष्य के मन में यह प्रश्न आ सकता है कि अगर कोई ईश्वर की भक्ति नहीं करता या उनकी प्राकृत शक्ति को स्वीकार नहीं करता तो क्या ईश्वर उससे नाराज हो सकते है ? क्या वो ईश्वर की कृपा को प्राप्त नहीं करेगा ? क्या उसे ईश्वर का धाम नहीं प्राप्त होगा ? ऐसे कई विचार मन में आ सकते है। श्री कृष्ण इन श्लोक में उनका जवाब देते है। 

कृष्ण कहते है कि मेरी व्यवस्था ही कुछ इस प्रकार की है कि मैं किसी भी जीव के साथ पक्षपात नहीं करता। ना मैं किसी से द्वेष करता हूं और ना ही किसी के प्रति मेरा क्रोध है। ये ब्रह्माण्ड, ये प्रकृति ये पंचभूत सबके लिए समान है। अगर कोई देवता है तो वो भी उसका उपभोग कर रहा है और अगर कोई असुर है तो वो भी इसका उपभोग कर रहा है। फिर फर्क क्या है ?

दरअसल फर्क किसी भी व्यक्ति की नीयत का है। उसकी बुद्धि का है और उसके मन का है। संसार में जो कुछ भी है अगर उसका सकारात्मक दृष्टिकोण से पालन किया जाए तो व्यक्ति ज्ञानी हो सकता है। वर्षा का जल अगर किसी नाले में गिरता है तो दूषित कहलाया जाता है लेकिन वही वर्षा का जल अगर किसी उत्तम भूमि पर गिरता है तो किसी बीज से सम्पर्क करके एक नवीन जीवन को शुरू कर देता है। 

इसलिए कृष्ण कहते है कि भले ही मैं किसी से द्वेष या पक्षपात नहीं करता लेकिन अगर कोई मेरा भक्त है और मेरे द्वारा वर्णित कर्मों को पूरी ईमानदारी और शुद्ध बुद्धि के साथ कर रहा है तो ऐसा मनुष्य मेरे ह्रदय ने निवास करेगा और मैं उसके ह्रदय में निवास करुँगा इसमें किंचित मात्र भी संशय नहीं है।
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