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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 28: जीवात्मा कर्म के बंधन से कैसे मुक्त हो सकती है? कृष्ण ने दिया ज्ञान

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Thu, 04 Jul 2024 04:27 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 28: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ, कृष्ण कहते है कि इन इच्छाओं से मुक्त हो जाओ। 

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 28:
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 28:- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 28: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ, कृष्ण कहते है कि इन इच्छाओं से मुक्त हो जाओ। तुम्हारे सांसारिक कर्म मुझे ही अर्पित कर दो, ऐसा करने से जीवात्मा के कर्म अपने आप शुद्ध हो सकते है। इसके बाद कृष्ण बोले-
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शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ( अध्याय 9 श्लोक 28 )

शुभ-अशुभ-फलैः-शुभ और अशुभ परिणाम; एवम्-इस प्रकार; मोक्ष्यसे-तुम मुक्त हो जाओगे; कर्म-कर्म; बन्धनैः-बन्धन से; संन्यास-योग-स्वार्थ के त्याग से; युक्त-आत्मा-मन को मुझमें अनुरक्त करके; विमुक्तः-मुक्त होना; माम्-मुझे उपैष्यसि–प्राप्त होगे।

अर्थ - इस तरह तुम कर्म के बन्धन तथा इसके शुभाशुभ फलों से मुक्त हो सकोगे। इस संन्यासयोग में अपने चित्त को स्थिर करके तुम मुक्त होकर मेरे पास आ सकोगे। 
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व्याख्या - कोई भी जीवात्मा जब जन्म लेती है तो उसे संसार में कर्म करना ही पड़ता है। खुद कृष्ण इस बात को कह चुके है कि उनकी प्राकृत शक्ति की व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि प्राणी बिना कर्म किए रह ही नहीं सकता लेकिन कर्म का बंधन ऐसा है कि इससे मुक्त होना जीवात्मा के लिए कठिन है। जब कोई भी मनुष्य अपने जीवन में कर्म करता है तो उसके अच्छे या बुरे दोनों प्रकार के परिणाम हो सकते है। दूसरा इस संसार में कोई भी कर्म पूर्ण शुद्ध नहीं है। यज्ञ को सबसे उत्तम कर्म बताया गया है। 

लेकिन कई बार यज्ञ की अग्नि में भी आस पास के कीट पतंग आकर मृत्यु को प्राप्त हो जाते है। मनुष्य कई बात न चाहते हुए भी किसी जीव की हत्या कर देता है और इस प्रकार स्वार्थ, द्वेष, प्रेम और मोह में पड़ा हुआ मनुष्य कर्म बंधन के कारण उसके फल को भोगता हुआ ना जाने कितनी बार इस मृत्यु लोक में जन्म लेता रहता है और फिर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। भगवान् श्री कृष्ण से इससे मुक्त होने का एक रास्ता जीवात्मा को दिखाया है। 

कृष्ण कहते है कि तुम जो भी कर्म करते हो उसके फल चाहे बुरे हो या अच्छे हो सब मुझे ही अर्पित कर दो। इससे ना तो तुम्हे हर्ष का अनुभव होगा और ना ही तुम शोक को प्राप्त होओगे। अगर कोई जीवात्मा कर्म के फल को श्री कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दे तो वह बंधन से मुक्त हो सकता है लेकिन उसके लिए मनुष्य के चित्त का एकाग्र होना ज़रूरी है। इस पूरी प्रक्रिया को श्री कृष्ण से संन्यास योग कहा है। जब कोई योग में स्थित प्राणी कर्म के शुभ और अशुभ प्रभाव से स्वयं को मुक्त करता है तो उसे योगी कहा जाता है। 

कृष्ण ने यह स्पष्ट रूप से कहा है कि ऐसा योगी पुरुष मृत्यु के बाद हर प्रकार के बंधन से मुक्त हो जाता है। ऐसे पुरुष को अंत में श्री कृष्ण का धाम ही प्राप्त हो जाता है। इसलिए मनुष्य को प्रयास करना चाहिए कि वो कर्म बंधन से मुक्त हो जाए।
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