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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 27: मनुष्य अपने सांसारिक कर्मों को कैसे शुद्ध कर सकता है? इसका क्या तरीका है ?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Wed, 03 Jul 2024 05:59 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 27: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- भक्त की भक्ति ही ईश्वर की करुणा के साथ जुड़ जाती है।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 27:
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 27:- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 27: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ- भक्त की भक्ति ही ईश्वर की करुणा के साथ जुड़ जाती है। आप कृष्ण को चाहे कितने ही उत्तम भोग अर्पित कर दे लेकिन अगर आपकी श्रद्धा और विश्वास में गड़बड़ है तो भक्ति अधूरी कही जायेगी। आगे कृष्ण कहते है -
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यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ( अध्याय 9 श्लोक 27 )

यत्-जो कुछ; करोषि-करते हो; यत्-जो भी; अश्नासि-खाते हो; यत्-जो कुछ; जुहोषि-यज्ञ में अर्पित करना; ददासि उपहार स्वरूप प्रदान करना; यत्-जो; यत्-जो भी; तपस्यसि-तप करते हो; कौन्तेय-कुन्तीपुत्र, अर्जुन; तत्-वह सब; कुरूष्व-करो; मत्-मुझको; अप्रणम्-अर्पण के रूप में।

अर्थ - तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ अर्पित करते हो या दान देते हो और जो भी तपस्या करते हो, उसे मुझे अर्पित करते हुए करो। 

व्याख्या - इस अध्याय के पिछले श्लोकों में श्री कृष्ण ने इस बात को समझाया कि सभी वस्तुएँ उन्हें अर्पित करनी चाहिए। ऐसा वो इसलिए कहते है ताकि जीवात्मा इस संसार के चक्र से मुक्त हो सके। इसके बाद लोक कल्याण करने के लिए वो अपनी बात को और आगे बढ़ाते है। वो अर्जुन से कहते है कि तुम्हे जो भी करना है मुझे ध्यान में रखते हुए करो। मनुष्य की समस्या यह हो जाती है कि वो जो करता है, खाता है, दान देता है या तप करता है कुछ न कुछ इच्छा से करता है। 
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कृष्ण कहते है कि इन इच्छाओं से मुक्त हो जाओ। तुम्हारे सांसारिक कर्म मुझे ही अर्पित कर दो, ऐसा करने से जीवात्मा के कर्म अपने आप शुद्ध हो सकते है। कृष्ण के कहने का अर्थ यह है कि जीवन में एक भी पल ऐसा नहीं हो जब भक्त अपने भगवान् को भूल जाए। आज के इस समय में जीवात्मा जो कर्म करती है उसमें कुछ ना कुछ दिखावा आ जाता है। या फिर स्वयं को उत्तम दिखाने के लिए लोग सांसारिक कर्म करने लगे है। 

लेकिन अपने भक्तों का कल्याण करने के लिए श्री कृष्ण कहते है कि ऐसा करने से उनके मन और बुद्धि अशुद्ध हो सकते है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वो जो भी कर्म करें कृष्ण को अर्पण करें। ऐसा करने से उसका कर्म शुद्ध होगा।
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