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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 26: भगवान कृष्ण को प्राप्त करने का मूल सिद्धांत क्या है ? कृष्ण ने दिया उत्तर

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Tue, 02 Jul 2024 03:22 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 26: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बाते है की आगे क्या हुआ- जो देवताओं की पूजा करते हैं वे देवताओं के बीच जन्म लेते हैं। जो पित्तरों की पूजा करते हैं वे पितरों की योनियों में जन्म लेते है।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 26:
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 26:- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 26: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बाते है की आगे क्या हुआ- जो देवताओं की पूजा करते हैं वे देवताओं के बीच जन्म लेते हैं। जो पित्तरों की पूजा करते हैं वे पितरों की योनियों में जन्म लेते है। भूत-प्रेतों की पूजा करने वाले उन्हीं के बीच जन्म लेते है और भक्त ईश्वर के धाम को जाता है। इसके बाद कृष्ण बोले -
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 26 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 26

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः 

पत्रम्-पत्ता; पुष्पम् पुष्प; फलम् फल; तोयम्-जल; यः-जो कोई; मे-मुझको; भक्त्या श्रद्धापूर्वक; प्रयच्छति-अर्पित करता है; तत्-वह; अहम्-मैं; भक्ति-उपन्नतम्-श्रद्धा भक्ति से अर्पित करना; अश्नामि स्वीकार करता हूँ। प्रयत-आत्मन:-शुद्व मानसिक चेतना के साथ।

 
अर्थ - यदि कोई प्रेम तथा भक्ति के साथ मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल प्रदान करता है, तो मैं प्रेमपूर्वक और शुद्ध मानसिक चेतना के साथ अर्पित वस्तु को स्वीकार कर लेता हूं। 
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व्याख्या - पिछले श्लोकों में श्री कृष्ण ने समझाया कि वो ही यज्ञ के स्वामी है, देवताओं को जो भी प्राप्त होता है वो उन्ही के पास जा रहा है। जो भक्ति करेगा उसे परम धाम प्राप्त होगा। इसके बाद श्री कृष्ण अपने करुणामयी स्वरुप को अर्जुन के सामने प्रकट करते है। वो कहते है कि वेदों में वर्णन किए गए कर्म से देवताओ एयर उनके लोक की प्राप्ति हो सकती है लेकिन अगर कोई ऐसा करने में असमर्थ है तो वो बिलकुल भी यह नहीं सोचे कि मैं उससे प्रसन्न नहीं हो सकता। 

ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए जो सबसे आवश्यक चीज है वो है प्रेम और भक्ति। जब बुद्धि शुद्ध होकर कृष्ण के कर्मयोग के सिद्धांत का पालन करने लगे और मन एकाग्र होकर कृष्ण के चरणों की सेवा में ही लगा रहे तो ऐसा व्यक्ति तो एक पुष्प अर्पित करके भी कृष्ण की कृपा का पात्र बन सकता है। उसे अनेक प्रकार के कर्म काण्ड करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है। भक्त की भक्ति ही ईश्वर की करुणा के साथ जुड़ जाती है। आप कृष्ण को चाहे कितने ही उत्तम भोग अर्पित कर दे लेकिन अगर आपकी श्रद्धा और विश्वास में गड़बड़ है तो भक्ति अधूरी कही जायेगी। 

हमारे शास्त्र और पुराणों में ऐसे ना जाने कितने भक्तों का वर्णन है जिन्होंने सिर्फ अपनी श्रद्धा और विश्वास से कृष्ण के प्रेम को प्राप्त किया। राजा बन जाने के बाद कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा के हाथ में सूखे चावल ग्रहण कर लिए जिसे देखकर सब चकित रह गए। ईश्वर बार बार आपको इन कथाओं के माध्यम से समझाते है कि उन्हें सिर्फ भक्ति और प्रेम से ही प्राप्त किया जा सकता है ना कि किसी प्रकार के दिखावे से या आडंबर से।
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