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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 24: उस आत्मा का क्या होता है जो कृष्ण के दिव्य रूप को नहीं जानता?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Mon, 01 Jul 2024 06:10 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 24: भगवद्गीता के इस लेख में हम आगे आपको बताते है की आगे क्या हुआ- देवताओं की पूजा करने वाला बुद्धिमान नहीं है। वो सुख तो भले ही प्राप्त कर सकता है।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 24
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 24- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 24: भगवद्गीता के इस लेख में हम आगे आपको बताते है की आगे क्या हुआ- देवताओं की पूजा करने वाला बुद्धिमान नहीं है। वो सुख तो भले ही प्राप्त कर सकता है लेकिन इस मृत्यु लोक से और जन्म मरण के चक्र से मुक्त होना उसके लिए आसान नहीं होगा। आगे कृष्ण कहते है -
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 24 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 24 

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते 

अहम्-मैं; हि-वास्तव में; सर्व-सब का; यज्ञानाम्-यज्ञ; भोक्ता–भोग करने वाला; च-और; प्रभुः-भगवान; एव-भी; च-तथा; न-नहीं; तु-लेकिन; माम्-मुझको; अभिजानन्ति–अनुभव करना; तत्त्वेन-दिव्य प्रकृति; अतः इसलिए; च्यवन्ति-पुनर्जन्म लेना।


अर्थ - मैं ही समस्त यज्ञों का एकमात्र भोक्ता तथा स्वामी हूं। अतः जो लोग मेरे वास्तविक दिव्य स्वभाव को नहीं पहचान पाते, वे नीचे गिर जाते हैं। 
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व्याख्या - श्री कृष्ण देवताओं की पूजा से होने वाले दोष को समझा रहे है। पिछले श्लोक में उन्होंने मनुष्य के कल्याण के लिए यह समझाया कि स्वर्ग को प्राप्त कर लेने का अर्थ जन्म मरण से मुक्ति लेना कदापि नहीं है। आपको वापिस इस संसार में आना ही होगा। इसके बाद वो कर्म कांड करने वाले और यज्ञ करने वाले मनुष्यों को सावधान कर रहे है। कृष्ण कहते है, कोई जीवात्मा चाहे किसी भी देवता को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ कर रही हो लेकिन उसका एकमात्र भोक्ता तो मैं ही हूं। 

यज्ञ को विष्णु का रूप कहा गया है और कृष्ण ने स्वयं इसे करने का आदेश दिया है। अर्जुन को कर्मयोग का ज्ञान देते समय कृष्ण ने ये स्पष्ट रूप से कहा है कि यज्ञ या विष्णु को प्रसन्न करने के लिए एक जीवात्मा को कर्म करना चाहिए। वेदों में भी श्री विष्णु को प्रसन्न करके के लिए ही कर्म कांड का आदेश दिया गया है। इसलिए यहां कृष्ण कहते है कि जीवात्मा को कर्म कांड करते समय अपनी बुद्धि को शुद्ध करना चाहिए। 

अगर कोई जीवात्मा सिर्फ किसी देवता को प्रसन्न करने के लिए उस यज्ञ में आहुति दे रही है तो वो जीवात्मा सिर्फ उस देवता को ही प्राप्त होगी। ऐसे लोग श्री कृष्ण का वास्तविक स्वभाव नहीं जान पाते है इसलिए वो एक समय के बाद वापिस इसी लोक में आकर दूसरा जन्म लेते है और माया के चक्र में उलझ जाते है। लाखों वर्षों की मेहनत के बाद एक आत्मा को शरीर रूप मिलता है। 

इस शरीर रूप को धारण करके के बाद आत्मा का लक्ष्य उस परम ईश्वर की प्राप्ति होना चाहिए ना कि भौतिक सुख सुविधा के लिए सिर्फ देवताओं को प्रसन्न करके खुश रहना। ऐसा करने से आपको कुछ समय का तो सुख मिल जाएगा लेकिन आपको मुक्ति नहीं प्राप्त होगी। 
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