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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 23:  देवताओं की पूजा करने वालों को भगवान ने बुद्धिमान क्यों नहीं कहा ?

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Mon, 01 Jul 2024 06:10 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 23 : भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ-  भगवान अपने  भक्त की न सिर्फ चिंता करते है बल्कि उसकी रक्षा के लिए भी तत्पर रहते है। यही ईश्वर का स्वभाव है।

भगवद गीता
भगवद गीता- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 23 : भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ-  भगवान अपने  भक्त की न सिर्फ चिंता करते है बल्कि उसकी रक्षा के लिए भी तत्पर रहते है। यही ईश्वर का स्वभाव है। आगे कृष्ण कहते है -
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 23 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 23


येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ( अध्याय 9 श्लोक 23 )

ये-जो; अपि यद्यपि; अन्य-दूसरे; देवता-देवताओं के; भक्ताः-भक्त; यजन्ते-पूजते हैं; श्रद्धया अन्विताः- श्रद्धा युक्त; ते–वे; अपि-भी; माम् मुझको; एव-केवल; कौन्तेय-कुन्तीपुत्र, अर्जुन; यजन्ति-पूजा करते हैं; अविधि-पूर्वकम् त्रुटिपूर्ण ढंग से।

अर्थ - जो श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे मेरी भी पूजा करते हैं। लेकिन वे यह सब अनुचित ढंग से करते हैं।

व्याख्या - इस श्लोक में श्री कृष्ण कहते है कि श्रद्धा से किया गया काम अच्छा होता है। उन्होंने दूसरे देवताओं की पूजा करने को अनुचित नहीं बताया। बल्कि यही कहा कि दूसरे देवता की पूजा मेरी ही पूजा है बस उन लोगों का ज्ञान पूर्ण नहीं है। ऐसे लोग ईश्वर के अविनाशी स्वरुप को समझ नहीं पाते है। देवता की अगर आप पूजा करते है तो वो अंत में कृष्ण को ही प्राप्त होती है। 
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लेकिन मनुष्य को इस बात को भी समझना चाहिए कि देवता हो या किसी भी प्रकार की कोई और शक्ति हो इन सबका निर्माण श्री कृष्ण ने ही किया है। इसलिए ये सब कृष्ण की सेवा में ही लगे है। ऐसे में जाहिर सी बात है कि अगर आपको कृष्ण की पूर्ण कृपा प्राप्त करनी है और इस संसार चक्र से मुक्त होना है तो परम ईश्वर की सेवा ज़रूरी है। पिछले श्लोकों में श्री कृष्ण इस बात को समझा चुके है कि स्वर्ग से भी एक समय के बाद आना ही पड़ता है। 

ऐसे में अगर जीवन भर कोई व्यक्ति मेहनत करे, अच्छे कर्म करे, देवताओं की सेवा करके स्वर्ग को प्राप्त हो जाए लेकिन एक समय के बाद अगर उसे वापिस इस मृत्यु लोक में आना पड़े तो ऐसे जीवन का क्या फायदा ? इसलिए श्री कृष्ण यहां कहते है कि देवताओं की पूजा करने वाला बुद्धिमान नहीं है। वो सुख तो भले ही प्राप्त कर सकता है लेकिन इस मृत्यु लोक से और जन्म मरण के चक्र से मुक्त होना उसके लिए आसान नहीं होगा।
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