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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 22: किस प्रकार के मनुष्यों की कृष्ण स्वयं रक्षा करते हैं ? जानिए ये बड़ा रहस्य

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Mon, 01 Jul 2024 06:09 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 22:  भगवद्गीता के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, वैदिक कर्म कांड को स्वीकार करने वाला, मनुष्य में तो उत्तम होगा लेकिन वह ईश्वर का परम धाम प्राप्त नहीं कर सकता।

भगवत गीता
भगवत गीता- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 22:  भभगवद्गीता के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, वैदिक कर्म कांड को स्वीकार करने वाला, मनुष्य में तो उत्तम होगा लेकिन वह ईश्वर का परम धाम प्राप्त नहीं कर सकता। इसके बाद कृष्ण ने कहा, 
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अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ( अध्याय 9 श्लोक 22 )


अनन्या:-सदैव; चिन्तयन्तः-सोचते हुए; माम्–मुझको; ये-जो; जनाः-व्यक्ति; पर्युपासते-पूजा करते हैं; तेषाम्-उनके; नित्य-सदा; अभियुक्तानाम्-सदैव भक्ति में तल्लीन मनुष्यों की; योग-आध्यात्मिक सम्पत्ति की आपूर्ति; क्षेम्-आध्यात्मिक संपदा की सुरक्षा; वहामि-वहन करता हूँ; अहम्-मैं।

अर्थ - किन्तु जो लोग अनन्यभाव से मेरे दिव्यस्वरूप का ध्यान करते हुए निरन्तर मेरी पूजा करते हैं, उनकी जो आवश्यकताएँ होती हैं, उन्हें मैं पूरा करता हूँ और जो कुछ उनके पास है, उसकी रक्षा करता हूं। 
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व्याख्या - पिछले श्लोक में श्री कृष्ण ने कहा है कि देवताओं की पूजा करने वाले या कर्म कांड करने वाले एक समय के बाद पृथ्वी पर जन्म लेते है। अगर किसी के मन में यह प्रश्न आ जाए कि अगर मैं सर्व शक्तिमान ईश्वर की ही पूजा करूँगा तो मेरे साथ क्या होगा ? यह श्लोक इसी प्रश्न का उत्तर है। इस श्लोक में श्री कृष्ण कहते है कि जो मेरे अनन्य भाव से यानी कि मेरे अलावा वो किसी और को सत्य नहीं मानते। दिव्य स्वरुप का यानी कि मेरे अविनाशी स्वरुप का जो ब्रह्मा के नष्ट होने के बाद भी बना रहता है। 

इसके बाद कृष्ण कहते है कि मेरी ही पूजा करते है यानी कि उन्हें किसी देवता से किसी भी प्रकार के भौतिक सुख की कामना नहीं होती है। वो सदैव अपने मन को कृष्ण के चरणों में तल्लीन रखते है। इसके बाद कृष्ण कहते है कि अगर कोई जीवात्मा ऐसा करने में सफल होती है तो मैं ना सिर्फ उनकी कामना को पूर्ण करता हूं बल्कि जो उनके पास है मैं उनकी रक्षा भी करता हूं। 

क्षेम का अर्थ है भगवान् द्वारा संरक्षण प्राप्त करना। जैसे एक माँ अपने अबोध बालक की हर इच्छा का ध्यान रखती है उसी प्रकार ईश्वर भी अपने भक्त की इच्छा का ध्यान रखते है लेकिन उसके लिए पूर्ण शरणागत होना ही पड़ता है। जो पूर्ण रूप से शरणागत नहीं होते है उनके साथ क्या होता है वो आगे के श्लोक में कृष्ण बताते है।
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