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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 21 : जो मनुष्य स्वर्ग में जाता है क्या वो फिर जन्म नहीं लेता? स्वर्ग में गई हुई

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Mon, 01 Jul 2024 06:08 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 21 : भगवद्गीता के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, किसी भी देवता को प्रसन्न करने के लिए किया गया कर्म कांड अंत में जाकर श्री कृष्ण को ही पुष्ट करता है। 

भागवतगीता
भागवतगीता- फोटो : jeevanjali

विस्तार


Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 21 : भगवद्गीता के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, किसी भी देवता को प्रसन्न करने के लिए किया गया कर्म कांड अंत में जाकर श्री कृष्ण को ही पुष्ट करता है। लेकिन कर्म कांड करके वाला मनुष्य संसार चक्र से मुक्त नहीं हो सकता। आगे कृष्ण कहते है-
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ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ( अध्याय 9 श्लोक 21 )

ते वे; तम्-उसको; भुक्त्वा–भोग करके; स्वर्ग-लोकम् स्वर्ग; विशालम्-गहन; क्षीणे समाप्त हो जाने पर; पुण्ये-पुण्य और पाप कर्म; मर्त्य-लोकम्-पृथ्वी लोक में; विशन्ति लौट आते हैं; एवम्-इस प्रकार; त्रयी-धर्म-वेदों के कर्मकाण्ड संबंधी भाग; अनुप्रपन्नाः-पालन करना; गत-आगतम्-बार बार आवागमन; काम-कामाः-इन्द्रिय भोग के विषय; लभन्ते–प्राप्त करते हैं।
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अर्थ -  जब वे स्वर्ग के सुखों को भोग लेते हैं और उनके पुण्य कर्मों के फल क्षीण हो जाते हैं तब फिर वे पृथ्वीलोक पर लौट आते हैं। इस प्रकार वे जो अपने इच्छित पदार्थ प्राप्त करने हेतु वैदिक कर्मकाण्डों का पालन करते हैं, बार-बार इस संसार में आवागमन करते रहते हैं। 

व्याख्या - यह श्लोक पिछले श्लोक का ही विस्तार है। पिछले श्लोक में श्री कृष्ण कहते है कि जो वैदिक कर्म कांड का पालन करता है वो देवताओं के पास जाकर सुख भोगता है। उसके बाद कृष्ण यह भी समझा रहे है कि वो सुख स्थायी नहीं होते। यानी कि आपके पुण्य और यज्ञ के प्रभाव से आपको देवताओं के समान सुख तो प्राप्त हो जाता है लेकिन जैसे ही आपके पुण्य क्षीण होते जाएंगे उसी अनुपात में स्वर्ग में रहने की अवधि कम हो जायेगी। 

जो सुख सुविधा आपको वहां प्राप्त हो रही है एक समय के बाद उनको आपसे वापिस ले लिया जाता है और इस मृत्यु लोक में दोबारा आपको जन्म लेना होता है। 

कहने का अर्थ यह है कि वैदिक कर्म कांड को स्वीकार करने वाला, मनुष्य में तो उत्तम होगा लेकिन वह ईश्वर का परम धाम प्राप्त नहीं कर सकता। कृष्ण का जो लोक है वह तो संसार के नष्ट होने के बाद भी बना रहता है इसलिए जो उस लोक में निवास करता है उसे एक कल्प के बाद भी जन्म नहीं लेना पड़ता है। 

वहीं जो सुख और सम्मान की इच्छा से देवताओं की सेवा करता है वो एक समय के बाद इस जन्म और मृत्यु के चक्र में फंस जाता है। इसलिए संसार के सुख की इच्छा न करते हुए कृष्ण भक्ति में लीन हो जाना चाहिए। इसके फल स्वरुप आप इस जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाएंगे। 

मनुष्य स्वर्ग लोक को बहुत उत्तम समझते है लेकिन पुराणों में लिखा है कि देवता भी मनुष्य जन्म लेने को आतुर रहते है ! आखिर ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए ताकि वो भी ईश्वर की भक्ति करके परम धाम को प्राप्त कर सकते है। इसलिए जो मनुष्य यह सोचते है कि वो स्वर्ग में चले जाएंगे तो उन्हें फिर जन्म नहीं लेना पड़ेगा वो गलत सोचते है। ईश्वर की माया हर जगह प्रभावी होती है। सिर्फ कृष्ण और उनके द्वारा निर्मित लोक में ही माया मनुष्य को नहीं व्यापती है।   

 
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