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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 19-20: आखिर किन मनुष्यों को मिल जाता है स्वर्ग? कृष्ण ने दिया उत्तर

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Fri, 28 Jun 2024 05:07 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 19-20: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ-  ब्रह्मा की आयु पूर्ण हो जाने के बाद भी कृष्ण नवीन बने रहते है इसलिए वो सबके पितामह भी है।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 19-20
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 19-20- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 19-20: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ-  ब्रह्मा की आयु पूर्ण हो जाने के बाद भी कृष्ण नवीन बने रहते है इसलिए वो सबके पितामह भी है। उनकी ही शक्ति से पंचभूत प्रकट हुए है इसलिए इस संसार में जो भी जानने योग्य है वो कृष्ण है। इसके बाद श्री कृष्ण ने कहा
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 19 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 19 

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन 

तपामि-गर्मी पहुँचाता हूँ; अहम् मैं; अहम्-मैं; वर्षम्-वर्षा; निगृह्णामि-रोकना; उत्सृजामि-लाता हूँ; च-और; अमृतम्-अमरत्व; च-और; एव-निश्चय ही; मृत्युः-मृत्यु; च-और; सत्-शाश्वत आत्मा; असत्-अस्थायी पदार्थ; च-तथा; अहम्-मैं; अर्जुन-अर्जुन।


अर्थ - मैं ही सूर्य को गर्मी प्रदान करता हूँ तथा वर्षा को रोकता और लाता हूं। मैं अनश्वर तत्त्व और उसी प्रकार से साक्षात् मृत्यु हूँ। मैं ही आत्मा और उसी प्रकार से मैं ही पदार्थ हूँ। 
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व्याख्या -इस श्लोक में भगवान् श्री कृष्ण इस बात को समझा रहे है कि जलीय अशुद्धि को दूर करने के लिए वो सूर्य का ताप बनकर उसे सोख लेते है और उसे ही अमृत बनाकर बरसा देते है। जो शक्ति हमें जीवन प्रदान करती है वह कृष्ण है और मरने के बाद भी हमें जहां जाकर एक रूप हो जाना है वह भी कृष्ण है। यहां कृष्ण यह भी कहते है कि आत्मा हो या अस्थायी पदार्थ हो सब उनके ही स्वरुप है। इसलिए किसी भी सांसारिक वस्तु को भिन्न रूप में नहीं समझना चाहिए। 

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 19 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 20 

त्रैविद्या माँ सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् 

त्रै-विद्या:-वैदिक कर्म काण्ड की विधियाँ; माम्-मुझको; सोम-पा:-सोम रस का सेवन करने वाले; पूत-पवित्र; पापा:-पापों का; यज्ञैः-यज्ञों द्वारा; इष्ट्वा –आराधना करके; स्व:-गतिम्-स्वर्ग लोक जाने के लिए; प्रार्थयन्ते-प्रार्थना करते हैं; ते–वे; पुण्यम्-पवित्र; सुर-इन्द्र–इन्द्र के; लोकम्-लोक को; अश्नन्ति–भोग करते हैं; दिव्यान्–दैवी; दिवि-स्वर्ग में; देव-भोगान्–देवताओं के सुख को।


अर्थ -  वे जिनकी रुचि वेदों में वर्णित सकाम कर्मकाण्डों में होती है वे यज्ञों के कर्मकाण्ड द्वारा मेरी आराधना करते हैं। वे यज्ञों के अवशेष सोमरस का सेवन कर पापों से शुद्ध होकर स्वर्ग जाने की इच्छा करते हैं। अपने पुण्य कर्मों के प्रभाव से वे स्वर्ग के राजा इन्द्र के लोक में जाते हैं और स्वर्ग के देवताओं का सुख ऐश्वर्य पाते हैं। 

व्याख्या - त्रैविद्या यानी वेद को समझने की विद्या। कृष्ण यहां पहले भी कह चुके है कि वेद उनके ही शब्द है और वेद में जो कर्म समझाए गए है उनको करने से मनुष्य की सद्गति होती है। इसलिए कृष्ण अर्जुन से कहते है कि वेद को पढ़ने वाले कर्म कांड करने वाले लोग उसी के द्वारा मुझे प्राप्त करने की कोशिश करते है। उनकी इच्छा संसार में उत्तम बनने की होती है इसलिए वो पाप से शुद्ध होकर पुण्य की वृद्धि करते है। ऐसे लोग बाद में स्वर्ग जाते है और बिलकुल स्वर्ग के देवताओं जैसा ही भोग उन्हें प्राप्त हो जाता है। 

इसे हम इस प्रकार से भी समझ सकते है कि किसी भी देवता को प्रसन्न करने के लिए किया गया कर्म कांड अंत में जाकर श्री कृष्ण को ही पुष्ट करता है। लेकिन कर्म कांड करके वाला मनुष्य संसार चक्र से मुक्त नहीं हो सकता है। कृष्ण यह पहले ही समझा चुके है कि स्वर्ग भी स्थायी नहीं है। एक समय के बाद वो भी नष्ट हो जाता है।
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