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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 17-18: श्री कृष्ण ने खुद को ब्रह्माण्ड का पिता क्यों कहा ? जानिए वजह

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Thu, 27 Jun 2024 05:11 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 17-18: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते बताते है की , श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया कि यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले स्वधा , औषधि,मंत्र और अग्नि स्वयं श्री कृष्ण ही हैं।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 17-18
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 17-18- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 17-18: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की , श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया कि यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले स्वधा , औषधि,मंत्र और अग्नि स्वयं श्री कृष्ण ही हैं। यज्ञ में प्रयुक्त होने मन्त्रों के स्तोत्र वेद और ओम् वह स्वयं हैं। आगे उन्होंने कहा-
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 17 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 17 

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च 

पिता-पिता; अहम्-मैं; अस्य-इसका; जगतः-ब्रह्माण्ड; माता-माता; धाता-रक्षक; पितामहः-दादा; वेद्यम्-ज्ञान का लक्ष्य; पवित्रम्-शुद्ध करने वाला; ओङ्कारः-पवित्र मंत्र ओम; ऋक्-ऋग्वेदा; साम–सामवेदा; यजुः-यजुर्वेदा; एव-निश्चय ही; च-तथा।


अर्थ - मैं इस ब्रह्माण्ड का पिता, माता, आश्रय तथा पितामह हूं। मैं ज्ञेय (जानने योग्य), शुद्धिकर्ता तथा ओंकार हूं। मैं ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद भी हूं। 
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व्याख्या - जैसा की हम पिछले श्लोकों में इस बात को समझ चुके है कि यह सम्पूर्ण संसार श्री कृष्ण से ही पैदा हुआ है इसलिए वो खुद को ब्रह्माण्ड का पिता कहते है। ब्रह्मा की आयु पूर्ण हो जाने के बाद भी कृष्ण नवीन बने रहते है इसलिए वो सबके पितामह भी है। उनकी ही शक्ति से पंचभूत प्रकट हुए है इसलिए इस संसार में जो भी जानने योग्य है वो कृष्ण है। हम वेदों से जो भी जानना चाहते हैं वह कृष्ण को जानने की दिशा में होता है। समस्त वैदिक मन्त्रों में ॐ शब्द, जिसे प्रणव कहा जाता है, वह भी कृष्ण है।  ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का सार भी कृष्ण है। 

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 18 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 18 

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्

गति:-परम लक्ष्य; भर्ता-पालक; प्रभुः-स्वामी; साक्षी-गवाह; निवासः-धाम; शरणम्-शरण; सुहृत्-परम मित्र; प्रभवः-मूल; प्रलयः-संहार; स्थानम्-भण्डारग्रह; निधानम्-आश्रय, स्थल; बीजम्-बीज, कारण कारण; अव्ययम्-अविनाशी।


अर्थ - मैं ही लक्ष्य, पालनकर्ता, स्वामी, साक्षी, धाम, शरणस्थली तथा अत्यन्तप्रिय मित्र हूं। मैं सृष्टि तथा प्रलय, सबका आधार, आश्रय तथा अविनाशी बीज भी हूं। 

व्याख्या - यहां श्री कृष्ण मनुष्य को समझा रहे है कि उसका लक्ष्य कृष्ण ही होना चाहिए। सांसारिक मोह माया में आकर मनुष्य भौतिक सुख सुविधा को ही सत्य मानकर जीवन नष्ट कर देता है। किन्तु संसार के इन सगे-संबंधियों में से कोई भी हमें पूर्ण और सच्चा प्रेम नहीं दे सकता जिसे पाने के लिए हमारी आत्मा तरसती रहती है। अतः मनुष्य को चाहिए कि कृष्ण तक सीधे पहुँचे, क्योंकि इससे समय तथा शक्ति की बचत होगी। सांसारिक प्रेम स्वार्थ पर आधारित होता है लेकिन कृष्ण का प्रेम मनुष्य को जन्म जन्मांतर से मुक्त करके की ताकत रखता है।
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